Wednesday, March 19, 2008

दलाई लामा का दर्द

नरोत्तम
भगवान बुद्ध के अनुयाइयों ने कभी सोचा भी न होगा कि उन्हें अपनी जिंदगी के लिए इतना संघर्ष करना पड़ेगा। होता भी कुछ ऐसा है कि आम लोगों की रक्षा का ढोंग करने वाले वर्तमान चालू कम्युनिष्टों ने सीधे सादे लोगों का जीना दूभर कर दिया है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि तिब्बत में जो लोग बचे हैं वे मौत के दिन गिन रहे हैं। दलाई लामा का नाम लेते हैं और जिंदा हैं। उन्हें आस है फिजां बदलेगी। दलाई लामा भी अपनी लड़ाई लड़े जा रहे हैं, लेकिन पूंजीवादी दुनिया में शान्ति के इस पुरोधा की सुनने वाला कौन है।धर्मशाला मे मंगलवार को दलाई लामा के अनुयायियों ने शक्ति प्रदर्शन किया और ये साबित करने की कोशिश की के अभी भी दलाई लामा ही तिब्बतियों के सर्वोच्च नेता हैं, बेशक कुछ संगठन उनसे सहमत ना हों. इन प्रदर्शनों के बीच ही दलाई लामा ने उन संगठनों के नेताओं से बातचीत भी की जो उनसे सहमत नहीं हैं. तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा के प्रवक्ता के अनुसार दलाई लामा ने उन्हें संघर्ष का तरीक़ा बदलने की सलाह दी. इन संगठनों में निर्वासित तिब्बतियों की यूथ कांग्रेस, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ तिब्बत और कई संगठनों के नेता शामिल थे.
दलाई लामा ने इन नेताओं से चीन सीमा की तरफ़ जारी संगठनों के मार्च को रद्द करने के लिए कहा है. हांलाकि दलाई लामा के प्रवक्ता का कहना है अब ये संगठनों की ज़िम्मेदारी है की वो दलाई लामा की बात को मानते हैं या नहीं. संगठनों की तरफ से तो आक्रोश नजर आता है लेकिन शान्ति के पुजारी दलाई लामा अपने क्रोध को पी चुके हैं। शायद उन्हें भी समझ में नहीं आ रहा कि जो जनता उन्हें देवता मानती है, अवतार मानकर पूजा करती है उनकी रक्षा कैसे की जाए।

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