खरीफ फसल का अंकगणित - बिहार में 150 करोड़ रु. की फसल बर्बाद
कुमार नरोत्तम / नई दिल्ली September 03, 2008
बिहार में आई विनाशकारी बाढ़ की वजह से 1.25 हेक्टेयर में फैली 150 करोड़ रुपये की फसल बर्बाद हुई है। राज्य कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह आंकड़ा आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि धान और मक्का की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई है। इसके अलावा दलहन, केला और सब्जियों की बागवानी भी बर्बाद हुए हैं। बर्बादी का आकलन फसल के क्षेत्रफल और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में औसत उपज के आधार पर किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बाढ़ के बाद खेतों में नमकीन रेत रह जाती है, तो इससे रबी फसल भी प्रभावित हो सकती है। उल्लेखनीय है कि राज्य की मुख्य खरीफ फसलों में चावल और मक्का है जिसकी बुआई जून-जुलाई में शुरू हो जाती है। मगर इस साल सुपौल, सहरसा, अररिया और मधेपुरा में आई बाढ़ से ये फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं।
विश्लेषक मानते हैं कि बिहार के दूसरे इलाके में इसके रकबे को बढ़ाकर इस नुकसान को कमोबेश कम किया जा सकता है। पिछले साल देश में 8 करोड़ 30 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ था, जो उससे पिछले साल के 8 करोड़ टन से थोडा ज्यादा था।
मोटे तौर पर भारत में इस साल जून तक 9 करोड़ 30 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ है। मगर इस साल बाढ़ की वजह से खरीफ की बुआई में 2 से 3 प्रतिशत की कमी देखी जा सकती है। देश में मक्के का उत्पादन 67 लाख हेक्टेयर में होने का अनुमान है।
Thursday, September 4, 2008
मदद की तलाश छोड़ बने मददगार
कुमार नरोत्तम / नई दिल्ली August 31, 2008
बिहार में बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के आम लोग अब राहत कार्य में मदद करने के लिए आगे बढ़ कर आए हैं।
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के ऐसे इलाके, जहां पानी नहीं घुसा है, वहां के हर घर से पांच रोटी और सब्जी एकत्रित की जा रही है। उसके बाद ये लोग पेड़ों पर कैंप लगाकर बाढ़ में फंसे लोगों को पुकार-पुकार कर खाना भेजने का प्रबंध कर रहे हैं।
खाने के साथ-साथ पीने के पानी की भी व्यवस्था की जा रही है। सहरसा के नजदीक डिस्टीलेशन केंद्र पर पानी को पैक कर सील करवाया जा रहा है और बाढ़ पीड़ितों को पानी मुफ्त में भेजा जा रहा है। सहरसा जिले के निवासी संजय कुमार ने बताया कि बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों के रेलवे स्टेशनों से गुजरने वाली ट्रेनों को रोककर हर बोगी में जा-जाकर बाढ़ पीड़ितों को खाना और पानी पहुंचाया जा रहा है।
बिहार में बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के आम लोग अब राहत कार्य में मदद करने के लिए आगे बढ़ कर आए हैं।
बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के ऐसे इलाके, जहां पानी नहीं घुसा है, वहां के हर घर से पांच रोटी और सब्जी एकत्रित की जा रही है। उसके बाद ये लोग पेड़ों पर कैंप लगाकर बाढ़ में फंसे लोगों को पुकार-पुकार कर खाना भेजने का प्रबंध कर रहे हैं।
खाने के साथ-साथ पीने के पानी की भी व्यवस्था की जा रही है। सहरसा के नजदीक डिस्टीलेशन केंद्र पर पानी को पैक कर सील करवाया जा रहा है और बाढ़ पीड़ितों को पानी मुफ्त में भेजा जा रहा है। सहरसा जिले के निवासी संजय कुमार ने बताया कि बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों के रेलवे स्टेशनों से गुजरने वाली ट्रेनों को रोककर हर बोगी में जा-जाकर बाढ़ पीड़ितों को खाना और पानी पहुंचाया जा रहा है।
छोटा पत्रकार बड़ा पत्रकार
समाज के इन दो वर्गों को कवर करते हुए पत्रकार भी दो श्रेणियों में बंटे हुए हैं. एक है छोटा पत्रकार. बेचारा. चेहरे पर दीन-हीन भाव, पिचके गाल और पेट, कभी कुर्ता तो कभी कंधे पर बैग लटकाए. दुम हिलाते आगे-पीछे घूमते हुए.
एक है बड़ा पत्रकार. चेहरे पर कुलीनता. मोटी तनख्वाहों से पेट और गाल फूलते हुए. कभी कुर्ता पहने तो चंपू बोले वाह सर क्या फैशन है. चार पांच चंपू आगे-पीछे घूमते हुए.
ख़बर भी इन दोनों के अंतर को समझती है. इसलिए छोटा पत्रकार ख़बर के पीछे भागता है. ख़बर बड़े पत्रकार के पीछे भागती है.
बड़ा पत्रकार ख़बर बनाता भी है. छोटा पत्रकार बड़े पत्रकार पर ख़बर लिखकर खुद को धन्य महसूस करता है. बड़े पत्रकार का पार्टियों में जाना, मैय्यत में जाना, नए ढंग से बाल कटवाना सब ख़बर है.
बड़ा पत्रकार पैदा होता है. छोटा पत्रकार छोटी जगह से आकर बड़ा बनने की कोशिश करता है.
बड़े पत्रकार के मुंह में चांदी की चम्मच होती है. वो बड़े स्कूलों में पढ़ने जाता है. शुरू से उसकी ज़बान अंग्रेजी बोलती है. हिंदी में वो सिर्फ़ अपनी कामवाली बाइयों और ड्राइवर से ही बात कर पाता है.
छोटा पत्रकार टाटपट्टियों पर बैठकर पढ़ाई करता है. मास्टरजी की बेंत उसके हाथों को लाल करती है. बारहवीं कक्षा तक फ़ादअ को फ़ादर और विंड को वाइंड कहता है. गुड मॉर्निंग कहने में ही उसके चेहरा शर्म से लाल हो जाता है.
नौकरियां छोटे पत्रकार को दुत्कारती हैं. बड़े पत्रकार को बुलाती हैं. नेता भी बड़े पत्रकार को पूछते हैं. छोटे से पूछते हैं तेरी औकात क्या है.
लेकिन छोटा कभी कभी बड़े काम करने की कोशिश भी करता है. कभी-कभी कर भी जाता है. लेकिन जब बड़ी ख़बर लेकर बड़े पत्रकार के पास जाता है तो बड़े पत्रकार को उसके इरादों पर शक होने लगता है.
कही ये अपनी औकात से बाहर तो नहीं निकल रहा. कहीं ये मेरी जगह लेने की कोशिश तो नहीं कर रहा. अबे ओ हरामी छोटे पत्रकार. अपनी औकात में रह. ये ख़बर अख़बार में नहीं जाएगी.
बड़ा पत्रकार कई बार छोटे को ख़बर का मतलब भी समझाने लगता है. देख छोटे. आज कल न ये समाजसेवी ख़बरों का ज़माना नहीं रहा. भ्रष्टाचार का खुलासा करेगा. अरे वो तो हर जगह है. आज के ज़माने में नई तरह की ख़बरें चलती हैं.
देख छोटे. टीवी चैनल्स को देख. वहां क्या नहीं बिक रहा है. खली चल रहा है. राखी सावंत के लटके-झटके चल रहे हैं. तू इन सबके बीच ये ख़बर कहां से ले आया रे.
लेकिन हुजूर हमें तो यही सिखाया गया. अबे चुप ईडियट. क्या पोंगा पंडितों की बात करता है. देख तेरी इच्छा यही है न कि तू भी बड़ा पत्रकार बने. बड़ी गाड़ी में घूमे. मोटी तनख्वाह पाए. इसलिए जो तूझे सिखाया गया उसको भूल जा. अब जैसा मैं करता हूं वैसा कर तो बड़ा पत्रकार बन जाएगा.
अबे तेरी औकात क्या है छोटे. कहता है बीस साल हो गए पत्रकारिता में. क्या मिला. अरे मिलेगा क्या. बाबाजी का घंटा. हमें देख. दस साल में कहां से कहां पहुंच गए.
छोटा और छोटा हो जाता है. लटका चेहरा लटक कर पैर तक पहुंचता है. घर पहुंचता है तो बीवी की मुस्कान उसे चुड़ैल के अट्टहास की तरह लगती है. कल तक जिस बेटे को सिर आँखों पर रखा उसे लात मार कर बोलता है अबे ओ छोटे की औलाद. तू ज़िंदगी भर छोटे की औलाद ही रहेगा.
Posted by akhilesh sharma
एक है बड़ा पत्रकार. चेहरे पर कुलीनता. मोटी तनख्वाहों से पेट और गाल फूलते हुए. कभी कुर्ता पहने तो चंपू बोले वाह सर क्या फैशन है. चार पांच चंपू आगे-पीछे घूमते हुए.
ख़बर भी इन दोनों के अंतर को समझती है. इसलिए छोटा पत्रकार ख़बर के पीछे भागता है. ख़बर बड़े पत्रकार के पीछे भागती है.
बड़ा पत्रकार ख़बर बनाता भी है. छोटा पत्रकार बड़े पत्रकार पर ख़बर लिखकर खुद को धन्य महसूस करता है. बड़े पत्रकार का पार्टियों में जाना, मैय्यत में जाना, नए ढंग से बाल कटवाना सब ख़बर है.
बड़ा पत्रकार पैदा होता है. छोटा पत्रकार छोटी जगह से आकर बड़ा बनने की कोशिश करता है.
बड़े पत्रकार के मुंह में चांदी की चम्मच होती है. वो बड़े स्कूलों में पढ़ने जाता है. शुरू से उसकी ज़बान अंग्रेजी बोलती है. हिंदी में वो सिर्फ़ अपनी कामवाली बाइयों और ड्राइवर से ही बात कर पाता है.
छोटा पत्रकार टाटपट्टियों पर बैठकर पढ़ाई करता है. मास्टरजी की बेंत उसके हाथों को लाल करती है. बारहवीं कक्षा तक फ़ादअ को फ़ादर और विंड को वाइंड कहता है. गुड मॉर्निंग कहने में ही उसके चेहरा शर्म से लाल हो जाता है.
नौकरियां छोटे पत्रकार को दुत्कारती हैं. बड़े पत्रकार को बुलाती हैं. नेता भी बड़े पत्रकार को पूछते हैं. छोटे से पूछते हैं तेरी औकात क्या है.
लेकिन छोटा कभी कभी बड़े काम करने की कोशिश भी करता है. कभी-कभी कर भी जाता है. लेकिन जब बड़ी ख़बर लेकर बड़े पत्रकार के पास जाता है तो बड़े पत्रकार को उसके इरादों पर शक होने लगता है.
कही ये अपनी औकात से बाहर तो नहीं निकल रहा. कहीं ये मेरी जगह लेने की कोशिश तो नहीं कर रहा. अबे ओ हरामी छोटे पत्रकार. अपनी औकात में रह. ये ख़बर अख़बार में नहीं जाएगी.
बड़ा पत्रकार कई बार छोटे को ख़बर का मतलब भी समझाने लगता है. देख छोटे. आज कल न ये समाजसेवी ख़बरों का ज़माना नहीं रहा. भ्रष्टाचार का खुलासा करेगा. अरे वो तो हर जगह है. आज के ज़माने में नई तरह की ख़बरें चलती हैं.
देख छोटे. टीवी चैनल्स को देख. वहां क्या नहीं बिक रहा है. खली चल रहा है. राखी सावंत के लटके-झटके चल रहे हैं. तू इन सबके बीच ये ख़बर कहां से ले आया रे.
लेकिन हुजूर हमें तो यही सिखाया गया. अबे चुप ईडियट. क्या पोंगा पंडितों की बात करता है. देख तेरी इच्छा यही है न कि तू भी बड़ा पत्रकार बने. बड़ी गाड़ी में घूमे. मोटी तनख्वाह पाए. इसलिए जो तूझे सिखाया गया उसको भूल जा. अब जैसा मैं करता हूं वैसा कर तो बड़ा पत्रकार बन जाएगा.
अबे तेरी औकात क्या है छोटे. कहता है बीस साल हो गए पत्रकारिता में. क्या मिला. अरे मिलेगा क्या. बाबाजी का घंटा. हमें देख. दस साल में कहां से कहां पहुंच गए.
छोटा और छोटा हो जाता है. लटका चेहरा लटक कर पैर तक पहुंचता है. घर पहुंचता है तो बीवी की मुस्कान उसे चुड़ैल के अट्टहास की तरह लगती है. कल तक जिस बेटे को सिर आँखों पर रखा उसे लात मार कर बोलता है अबे ओ छोटे की औलाद. तू ज़िंदगी भर छोटे की औलाद ही रहेगा.
Posted by akhilesh sharma
मायावती की तो जान ही ले लेते!
» रात्रि उड़ान के लिए प्रतिबंधित हेलीकॉप्टर उड़ा रहे थे कैबिनेट सेक्रेटरी
» प्रदेश के उड्डयन महकमे में भीषण भ्रष्टाचार, खतरे में वीवीआईपी उड़ानें
» बिना किसी ट्रेनिंग के उड़ा रहे हैं अमेरिकी विमान और हेलीकॉप्टर
एक सितम्बर की रात प्रदेश में एक बड़ा हादसा हो सकता था। जो नौकरशाह मुख्यमंत्री की हिफाजत के प्रति आधिकारिक तौर पर जवाबदेह हैं वे अपनी गैरजिम्मेदाराना हरकतों से उस दिन मुख्यमंत्री मायावती की जान ही ले लेते। वीवीआईपी उड़ान की उच्च संवेदनशीलता के बावजूद उस दिन जिस स्तर की खतरनाक तकनीकी चूक की गई, वह उड्डयन इतिहास का नायाब पन्ना है। जिस सिंगल इंजिन हेलीकॉप्टर पर मुख्यमंत्री मायावती को बैठा कर रात में संत कबीर नगर और फैजाबाद ले जाया गया, उस हेलीकॉप्टर के लिए रात की फ्लाइंग कानूनन प्रतिबंधित है। उसमें रात्रि उड़ान के उपकरण हैं ही नहीं। रात में जब मुख्यमंत्री को लेकर वही हेलीकॉप्टर संत कबीर नगर से उड़ा तो टेक-ऑफ के लिए कारों की बत्तियां जलानी पड़ीं। फिर फैजाबाद में नाइट लैंडिंग का खतरनाक जोखिम उठाया गया। उसके बाद लखनऊ से गए विमान से मायावती वापस लौटीं। बात यहां खत्म नहीं होती। बात यहीं से शुरू होती है। वीवीआईपी उड़ान को लेकर यह जो गैरजिम्मेदाराना कृत्य हुआ वह उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह ने किया। सिंगल इंजिन वाला जर्जर हेलीकॉप्टर खुद शशांक और विंग कमांडर आरएन सेनगुप्ता उड़ा रहे थे। शशांक प्रदेश सरकार के उड्डयन सलाहकार भी हैं और पाइलट भी। प्रतिबंधित हेलीकॉप्टर को रात में उड़ाने का मसला नागरिक उड्डयन महानिदेशालय [डीजीसीए] तक तूल न पकड़े इसके लिए उड़ान दस्तावेजों में समय को लेकर फर्जी तथ्य भी दर्ज किए गए।
फैजाबाद में एयरपोर्ट अथॉरिटी का कोई एयर ट्रैफिक कंट्रोल नहीं है, लिहाजा हेलीकॉप्टर की लैंडिंग का समय अपनी मर्जी से शाम करीब सवा छह बजे और हवाई जहाज के टेक-ऑफ का समय करीब साढ़े छह बजे दर्ज कर दिया गया। लेकिन लखनऊ के एयर ट्रैफिक कंट्रोल में मायावती को लेकर आए विमान [सुपर किंग एयर] के लखनऊ पहुंचने का समय आधिकारिक तौर पर रात का सवा आठ [8.15] दर्ज है। अगर हवाई जहाज ने साढ़े छह बजे शाम फैजाबाद से लखनऊ के लिए उड़ान भरी तो उसे लखनऊ पहुंचने में सवा दो घंटे क्यों लगे? मुख्यमंत्री की सुरक्षा को लेकर उड्डयन महकमे की लापरवाही का आलम यह है कि उन्हें 'रेस्क्यु’ कर लाने के लिए भेजे गए विमान को भी अयोग्य घोषित पाइलट ही उड़ा रहे थे। इनमें से एक वयोवृद्ध कैप्टन पीसीएफ डिसूजा मेडिकली अनफिट हैं तो दूसरे कैप्टन वीवी सिंह भी करीब 62 साल के हैं जो उड़ान अर्हता पास नहीं हैं।
अमेरिका से बड़े नाज नखरे से जो विमान [वीटीयूपीएन] और हेलीकॉप्टर [वीटीयूपीओ] लखनऊ लाया गया था, उससे जुड़े तथ्य भी कम रोचक-रोमांचक नहीं हैं। विमान पूर्ण रूप से जेट विमान है। इसे उड़ाने की योग्यता उत्तर प्रदेश में किसी के पास नहीं है। लेकिन उक्त विमान और हेलीकॉप्टर दोनों से ही वीवीआईपी सवारियां लेकर उड़ान भरने का भारी रिस्क लगातार उठाया जा रहा है। अभी एक सितम्बर को उसी अमेरिकी हेलीकॉप्टर पर मुख्यमंत्री को बिठा कर उड़ान भरने की कोशिश की गई, लेकिन वह हवा में धचके खाने लगा। किसी तरह हेलीकॉप्टर उतारा गया।
जेट विमान को उड़ाने की ट्रेनिंग के लिए योग्य पाइलटों को न भेज कर कैप्टन वीवी सिंह [62] और वायुसेना से डेपुटेशन पर आए विंग कमांडर राजेश कुमार नागर को अमेरिका भेजा गया। लेकिन कैप्टन वीवी सिंह उड़ान प्रशिक्षण पास नहीं कर पाए। ...और नागर वही हैं जो अभी हाल ही इलाहाबाद में राज्य सरकार का विमान दुर्घटनाग्रस्त कर चुके हैं। हैरत यह है कि अपने प्रदेश के कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह अमेरिका से आया विमान और हेलीकॉप्टर दोनों ही उड़ा रहे हैं। शशांक जेट विमान की ट्रेनिंग लेने अमेरिका गए भी नहीं और डीजीसीए से 'इंडोर्समेंट’ भी पा लिया!
जिस दिन दिल्ली में विश्वास मत पर संसद में वोट पड़ने वाला था, उस दिन मुख्यमंत्री मायावती की सुरक्षा के साथ विश्वासघात की वजह तैयार हो रही थी। उन्हें उसी जेट विमान से शशांक दिल्ली लेकर गए। शशांक उस विमान को 'सिंगल क्वालिफायड पाइलट’ के बतौर अकेले ही उड़ा रहे थे। डीजीसीए का उड़ान नियम यह कहता है कि पाइलट को सम्बद्ध विमान उड़ाने का कम से कम 50 घंटे का अनुभव बतौर पाइलट इन कमांड [पीआईसी] होना चाहिए। इसके अलावा 50 घंटे की नाइट फ्लाइंग का अनुभव भी अनिवार्य है।
अभी 13/14 अगस्त को कैबिनेट सेक्रेटरी इसी जेट विमान को अकेले उड़ा कर दिल्ली गए। शशांक अपना रूटीन पाइलट मेडिकल जांच कराने गए थे। शाम को 7.17 पर विमान लेकर पालम से उड़े। लेकिन उड़ते ही एटीसी से वापस इमरजेंसी लैंडिंग की इजाजत मांगने लगे। 7.34 में पालम पर ही वापस लैंड किया। पाया गया कि गलत हैंडलिंग के कारण विमान में 'ट्रिम फेल्योर’ हो गया जिस वजह से विमान का नियंत्रण खो चुका था। एयरपोर्ट अथॉरिटी ने इस खराबी के बारे में डीजीसीए को फौरन ही इत्तिला कर दी। लेकिन विमान में खराबी क्यों आई? प्रदेश की मुख्यमंत्री को इन तथ्यों की जानकारी नहीं दी जाती। लखनऊ में बसपाई रैली के दिन उसी अमेरिकी हेलीकॉप्टर से शशांक शेखर उन्हें रैली स्थल तक ले गए थे, जिस दिन मायावती ने मंच से कहा था, 'मेरी जान को खतरा है...’
प्रभात रंजन दीन
» प्रदेश के उड्डयन महकमे में भीषण भ्रष्टाचार, खतरे में वीवीआईपी उड़ानें
» बिना किसी ट्रेनिंग के उड़ा रहे हैं अमेरिकी विमान और हेलीकॉप्टर
एक सितम्बर की रात प्रदेश में एक बड़ा हादसा हो सकता था। जो नौकरशाह मुख्यमंत्री की हिफाजत के प्रति आधिकारिक तौर पर जवाबदेह हैं वे अपनी गैरजिम्मेदाराना हरकतों से उस दिन मुख्यमंत्री मायावती की जान ही ले लेते। वीवीआईपी उड़ान की उच्च संवेदनशीलता के बावजूद उस दिन जिस स्तर की खतरनाक तकनीकी चूक की गई, वह उड्डयन इतिहास का नायाब पन्ना है। जिस सिंगल इंजिन हेलीकॉप्टर पर मुख्यमंत्री मायावती को बैठा कर रात में संत कबीर नगर और फैजाबाद ले जाया गया, उस हेलीकॉप्टर के लिए रात की फ्लाइंग कानूनन प्रतिबंधित है। उसमें रात्रि उड़ान के उपकरण हैं ही नहीं। रात में जब मुख्यमंत्री को लेकर वही हेलीकॉप्टर संत कबीर नगर से उड़ा तो टेक-ऑफ के लिए कारों की बत्तियां जलानी पड़ीं। फिर फैजाबाद में नाइट लैंडिंग का खतरनाक जोखिम उठाया गया। उसके बाद लखनऊ से गए विमान से मायावती वापस लौटीं। बात यहां खत्म नहीं होती। बात यहीं से शुरू होती है। वीवीआईपी उड़ान को लेकर यह जो गैरजिम्मेदाराना कृत्य हुआ वह उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह ने किया। सिंगल इंजिन वाला जर्जर हेलीकॉप्टर खुद शशांक और विंग कमांडर आरएन सेनगुप्ता उड़ा रहे थे। शशांक प्रदेश सरकार के उड्डयन सलाहकार भी हैं और पाइलट भी। प्रतिबंधित हेलीकॉप्टर को रात में उड़ाने का मसला नागरिक उड्डयन महानिदेशालय [डीजीसीए] तक तूल न पकड़े इसके लिए उड़ान दस्तावेजों में समय को लेकर फर्जी तथ्य भी दर्ज किए गए।
फैजाबाद में एयरपोर्ट अथॉरिटी का कोई एयर ट्रैफिक कंट्रोल नहीं है, लिहाजा हेलीकॉप्टर की लैंडिंग का समय अपनी मर्जी से शाम करीब सवा छह बजे और हवाई जहाज के टेक-ऑफ का समय करीब साढ़े छह बजे दर्ज कर दिया गया। लेकिन लखनऊ के एयर ट्रैफिक कंट्रोल में मायावती को लेकर आए विमान [सुपर किंग एयर] के लखनऊ पहुंचने का समय आधिकारिक तौर पर रात का सवा आठ [8.15] दर्ज है। अगर हवाई जहाज ने साढ़े छह बजे शाम फैजाबाद से लखनऊ के लिए उड़ान भरी तो उसे लखनऊ पहुंचने में सवा दो घंटे क्यों लगे? मुख्यमंत्री की सुरक्षा को लेकर उड्डयन महकमे की लापरवाही का आलम यह है कि उन्हें 'रेस्क्यु’ कर लाने के लिए भेजे गए विमान को भी अयोग्य घोषित पाइलट ही उड़ा रहे थे। इनमें से एक वयोवृद्ध कैप्टन पीसीएफ डिसूजा मेडिकली अनफिट हैं तो दूसरे कैप्टन वीवी सिंह भी करीब 62 साल के हैं जो उड़ान अर्हता पास नहीं हैं।
अमेरिका से बड़े नाज नखरे से जो विमान [वीटीयूपीएन] और हेलीकॉप्टर [वीटीयूपीओ] लखनऊ लाया गया था, उससे जुड़े तथ्य भी कम रोचक-रोमांचक नहीं हैं। विमान पूर्ण रूप से जेट विमान है। इसे उड़ाने की योग्यता उत्तर प्रदेश में किसी के पास नहीं है। लेकिन उक्त विमान और हेलीकॉप्टर दोनों से ही वीवीआईपी सवारियां लेकर उड़ान भरने का भारी रिस्क लगातार उठाया जा रहा है। अभी एक सितम्बर को उसी अमेरिकी हेलीकॉप्टर पर मुख्यमंत्री को बिठा कर उड़ान भरने की कोशिश की गई, लेकिन वह हवा में धचके खाने लगा। किसी तरह हेलीकॉप्टर उतारा गया।
जेट विमान को उड़ाने की ट्रेनिंग के लिए योग्य पाइलटों को न भेज कर कैप्टन वीवी सिंह [62] और वायुसेना से डेपुटेशन पर आए विंग कमांडर राजेश कुमार नागर को अमेरिका भेजा गया। लेकिन कैप्टन वीवी सिंह उड़ान प्रशिक्षण पास नहीं कर पाए। ...और नागर वही हैं जो अभी हाल ही इलाहाबाद में राज्य सरकार का विमान दुर्घटनाग्रस्त कर चुके हैं। हैरत यह है कि अपने प्रदेश के कैबिनेट सेक्रेटरी शशांक शेखर सिंह अमेरिका से आया विमान और हेलीकॉप्टर दोनों ही उड़ा रहे हैं। शशांक जेट विमान की ट्रेनिंग लेने अमेरिका गए भी नहीं और डीजीसीए से 'इंडोर्समेंट’ भी पा लिया!
जिस दिन दिल्ली में विश्वास मत पर संसद में वोट पड़ने वाला था, उस दिन मुख्यमंत्री मायावती की सुरक्षा के साथ विश्वासघात की वजह तैयार हो रही थी। उन्हें उसी जेट विमान से शशांक दिल्ली लेकर गए। शशांक उस विमान को 'सिंगल क्वालिफायड पाइलट’ के बतौर अकेले ही उड़ा रहे थे। डीजीसीए का उड़ान नियम यह कहता है कि पाइलट को सम्बद्ध विमान उड़ाने का कम से कम 50 घंटे का अनुभव बतौर पाइलट इन कमांड [पीआईसी] होना चाहिए। इसके अलावा 50 घंटे की नाइट फ्लाइंग का अनुभव भी अनिवार्य है।
अभी 13/14 अगस्त को कैबिनेट सेक्रेटरी इसी जेट विमान को अकेले उड़ा कर दिल्ली गए। शशांक अपना रूटीन पाइलट मेडिकल जांच कराने गए थे। शाम को 7.17 पर विमान लेकर पालम से उड़े। लेकिन उड़ते ही एटीसी से वापस इमरजेंसी लैंडिंग की इजाजत मांगने लगे। 7.34 में पालम पर ही वापस लैंड किया। पाया गया कि गलत हैंडलिंग के कारण विमान में 'ट्रिम फेल्योर’ हो गया जिस वजह से विमान का नियंत्रण खो चुका था। एयरपोर्ट अथॉरिटी ने इस खराबी के बारे में डीजीसीए को फौरन ही इत्तिला कर दी। लेकिन विमान में खराबी क्यों आई? प्रदेश की मुख्यमंत्री को इन तथ्यों की जानकारी नहीं दी जाती। लखनऊ में बसपाई रैली के दिन उसी अमेरिकी हेलीकॉप्टर से शशांक शेखर उन्हें रैली स्थल तक ले गए थे, जिस दिन मायावती ने मंच से कहा था, 'मेरी जान को खतरा है...’
प्रभात रंजन दीन
बिहार में क्या मुद्दा नहीं है
बिहार सम्पूर्ण भ्रांति में घिसटसामाजिक अन्याय का प्रदेश रहा हैता हुआ भीषण , रखा गया है और उसे ऐसा ही बनाए रखा जाएगा। आजादी के बाद से अब तक जितने भी 31 मुख्यमंत्री हुए, श्रीकृष्ण सिंह से लेकर कृष्ण वल्लभ सहाय, बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव और नीतीश कुमार तक सब एक ही धूर्त नस्ल के रहे हैं। इनकी मक्कारी के कारण पैदा होती रही सिलसिलेवार वजहों से बिहार आज इस दुर्दशा तक पहुंचा है और विध्वंस की चरम स्थिति तक जल्दी ही पहुंचने वाला है। बिहार की इस नकारात्मक विकास-यात्रा के संवाहक लीडरों में इतनी भी पुंसकता नहीं कि वे इस पर सार्थक बहस में उतरने का साहस करें। वे बहस में उतरने का केवल स्वांग भरते हैं। दरअसल वे बहस में नहीं, कलह में उतरते हैं। एक दूसरे को गरियाते हैं। बेटी-रोटी करते हैं या कमजोर पड़ने पर हास्य अभिनेता के भौंडे रोल में उतरने से जरा भी नहीं हिचकते। बिहार में बाढ़ मुद्दा जरूर है। लेकिन आप बताएं कि बिहार में क्या मुद्दा नहीं है। यह अलग बात है कि मुद्दा बनता नहीं है...
बिहार में बाढ़ को लेकर तमाम अखबारों में खबरें आ रही हैं। विजुअल मीडिया भी बिहार की बाढ़ पर पिला पड़ा है। बाढ़ की त्रासदी को लेकर चाहे प्रिंट मीडिया हो या विजुअल मीडिया, दोनों ही अपनी संवेदनशीलता दिखा रहे हैं, या दोनों ही, बाढ़-त्रासदी को बाजार में बेच रहे हैं। बिहार में बाढ़ अभी प्रलय का रूप नहीं ले रही है। लेकिन वह समय भी जल्दी ही आने वाला है जब बिहार केवल भारत के नक्शे की निशानी के बतौर रह जाएगा और वहां कोशी, बागमती और बूढ़ी गंडक जैसी नदियां हहराती हुई गंगा की धार में मिलती बहती दिखेंगी और बिहार तल में होगा। सम्पूर्ण मीडिया बाढ़ के प्रकोप और उससे आक्रांत लोगों की त्रासदी दिखा रहा है, प्रशासनिक नाकामियां और नेपाल की बदमाशियां दिखा रहा है, लेकिन असली जख्म कहां है, मीडिया को दिख नहीं रहा, इसलिए दिखा नहीं रहा। आम फहम बात चलती है कि राजनीतिक रूप से बिहार बहुत ही जागरूक प्रदेश है। लेकिन आप मानें कि बिहार के लोग राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता की दृष्टि से बिल्कुल मूढ़ हैं। उन्हें जागरूक बता-बता कर कुछ नेताओं ने बिहार के लोगों को बेवकूफ बनाया है, उन्हें बेचा है। इतना बेचा कि आज बिहारियों की कोई कीमत और कोई वकत नहीं रह गई। जिस प्रदेश के लोग आजादी के बाद से आज तक अपने सरोकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए, जो अधिकार-अधिकार का प्रलाप करते रहे और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए, जिन्हें सड़क-बांध और नदियों-नालों की सुरक्षा के प्रति कोई जागरूक-चिंता नहीं रही, जो जानवर की हद तक जाकर जीने के लिए तैयार होते रहे, उस नागरिक-जमात को जागरूक बताना उसे बेवकूफ बनाना ही तो है। बुद्ध-महावीर की धरती, चाणक्य और चंद्रगुप्त की धरती, अंगराज कर्ण और महावीर जरासंध की धरती, महान अशोक की धरती, वीर कुंअर सिंह की धरती, खुदीराम बोस की धरती, राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण की धरती, दिनकर और गोपाल सिंह नेपाली की धरती... और जाने क्या-क्या बता बता कर इस प्रदेश में मूढ़ता का सुनियोजित सृजन किया गया। पूर्वज हाथी पालते थे, हम हाथी बांधने की जंजीरें भांजने की नितांत मूर्ख हरकतों में लगे हैं। विडम्बना यह है कि बिहार के लोगों को जागरूक बता कर सामाजिक-मूढ़ता का नियोजित विस्तार करने वाले वे सारे 'लीडर’ उत्तर-स्वतंत्रता-काल से लेकर बिहार की सम्पूर्ण क्रांति और सामाजिक न्याय तक के स्वयंभू ठेकेदार हैं। उनके घर बाढ़ में नहीं बहते। उनके बच्चे राहत सामग्री के लिए टकटकी बांधे नहीं रहते। उनके घर की महिलाओं को बाढ़ के पानी में जंघा तक कपड़े उठाए चलने की व्यथा नहीं झेलनी पड़ती। वे हेलीकॉप्टर से फेंकी गई कृपादृष्टि और राहत सामग्री के कातर पात्र नहीं। वे तो उड़नखटोले पर विचरण करते हुए भेंड़-बकरियों के सदृश बिहार के लोगों पर सामाजिक न्याय की समग्र दृष्टि डालते हैं। बात सुनने में कड़वी जरूर है, लेकिन हेलीकॉप्टर में दूरबीन लिए बैठे नेता को हेलीकॉप्टर की चक्रवाती हवा में महिलाओं के उड़ते बिखरते कपड़ों को देखते और कुत्सित मौज लेते मीडिया के न जाने कितने साथियों ने देखा होगा, लेकिन यह उनके लिए मुद्दा नहीं है। बात सुनने और कहने दोनों में कड़वी है, लेकिन इससे कब तक बचेंगे! सच को दबाए रखने और छद्म को उघारे रखने के कारण ही तो बिहार की यह दशा हुई है।
बिहार सम्पूर्ण भ्रांति में घिसटता हुआ भीषण सामाजिक अन्याय का प्रदेश रहा है, रखा गया है और उसे ऐसा ही बनाए रखा जाएगा। आजादी के बाद से अब तक जितने भी 31 मुख्यमंत्री हुए, श्रीकृष्ण सिंह से लेकर कृष्ण वल्लभ सहाय, बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव और नीतीश कुमार तक सब एक ही धूर्त नस्ल के रहे हैं। इनकी मक्कारी के कारण पैदा होती रही सिलसिलेवार वजहों से बिहार आज इस दुर्दशा तक पहुंचा है और विध्वंस की चरम स्थिति तक जल्दी ही पहुंचने वाला है। पूछिए कर्पूरी ठाकुर के समकालीन किसी भी राजनीतिक या समाजसेवी से। अगर वह आपको ईमानदारी से बताए कि कैसे वे चूड़ा-दही जीम कर सुबह-सुबह पिछले दरवाजे से निकल जाते थे। अपने कुर्ते की जेब में दतवन [दातुन] रखते थे। उनके घर जनता का जमावड़ा लग जाता तो करीब बारह-एक बजे वे सामने के रास्ते से परेशान-हाल दतवन करते पैदल आते दिखते। जनता स्तब्ध उन्हें देखती रहती और कर्पूरी जी उन्हें समझाते, 'आप ही लोगों के काम में सुबह से लगा रहता हूं, मुंह तक धोने का टाइम नहीं मिलता।’ चमत्कृत लोग अपनी बात बताना भी भूल जाते और फिर भी प्रभावित होकर जाते कि लीडर जनता के काम में इतना व्यस्त है कि दोपहर तक मुंह भी नहीं धो पाता। इस तरह के नियोजित छद्म से ही बिहार के नेताओं की दुकानें चलती रही हैं। जब जननायकों की छवि वाले लीडरों का यह असली चेहरा था तो लालू-नीतीश जैसे नेताओं के आडम्बर के स्तर के बारे में एक बिहारी क्या समस्त देशवासी आसानी से समझ सकता है। लालू-राबड़ी शासनकाल में सड़कों की दुर्दशा के बारे में उनसे पूछा जाता था, तो लालू सामाजिक न्याय की नायाब परिभाषाएं रचते थे। पक्की सड़क को सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतीक बताते थे और लोगों को सावधान करते थे कि पक्की सड़कें बनीं तो पुलिस गांव तक पहुंच जाएगी। बिहार के विकास-पुरूष लालू पक्की सड़क और ठोस ढांचे का विरोध करते हुए, चारा खाते हुए अपना ढांचा ठोस करने में कामयाब रहे। ललित नारायण मिश्र की हत्या पर चुप्पी साधे रहने के एवज में मुख्यमंत्री का पद पाए शिक्षक डॉ. जगन्नाथ मिश्र की वैभव यात्रा, फुलवारीशरीफ के पशुपालन विभाग के सीलन भरे कमरे में जिंदगी जीने वाले निम्न दर्जे के छात्र रहे लालू यादव और राजेंद्र नगर से कंकड़बाग तक किराए का कमरा ढूंढ़ने वाले नीतीश कुमार के भौतिक उठान और चारित्रिक गिरान का ग्राफ आपको बिहार की सड़कों और बांधों के जर्जर होने की कहानी तो बता ही रहा है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण कहता है कि प्रखरता और मूढ़ता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 'इंटेलिजेंस’ और 'इडियॉसी’ दोनों साथ-साथ ही चलती है। बिहार में 'इंटेलिजेंस’ का दौर कभी था। अभी 'इडियॉसी’ का दौर चल रहा है। या कहें 'इंटेलिजेंस’ आजादी के बाद बिहार पर राज करने वाले राजनीतिकों के ठेके में रही और 'इडियॉसी’ बिहार के आम आदमी के मत्थे मढ़ी जाती रही। बिहार में बाढ़ मुद्दा जरूर है। लेकिन आप बताएं कि बिहार में क्या मुद्दा नहीं है। यह अलग बात है कि मुद्दा बनता नहीं है। क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बाढ़ से राहत दिलाने में असमर्थता जताना राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है? अपने शासन के लम्बे 15 अराजक साल भूल कर नीतीश कुमार पर लालू यादव का कटाक्ष करना क्या मुद्दा नहीं? नेपाल की तरफ से कोशी का पानी लगातार छोड़े जाने के कृत्य के खिलाफ केंद्र सरकार का कूटनीतिक हस्तक्षेप न करना क्या मुद्दा नहीं है? 31 मुख्यमंत्रियों से बिहार के विकास और उनके व्यक्तिगत विकास का फर्क पूछने और पाई-पाई हिसाब लिए जाने का मुद्दा न तो कभी मीडिया को दिखा है और न धंधा करने वाले सामाजिक संगठनों को। बिहार में तमाम किस्म की अधोवृत्तियां कर रही राजनीतिक पार्टियों से तो कुछ सकारात्मक लोकतांत्रिक अपेक्षा रखना वैसा ही है जैसे बिहारियों को बहुत जागरूक बता कर लल्लू का उल्लू साधना। बिहार की इस नकारात्मक विकास-यात्रा के संवाहक लीडरों में इतनी भी पुंसकता नहीं कि वे इस पर सार्थक बहस में उतरने का साहस करें। वे बहस में उतरने का केवल स्वांग भरते हैं। दरअसल वे बहस में नहीं, कलह में उतरते हैं। एक दूसरे को गरियाते हैं। बेटी-रोटी करते हैं या कमजोर पड़ने पर हास्य अभिनेता के भौंडे रोल में उतरने से जरा भी नहीं हिचकते। बाढ़ तो बिहार के लिए मौसम की तरह है। आजादी के बाद से आज तक बांधों की कोई देखरेख नहीं हुई। अब तक 31 मुख्यमंत्री आए और गए। जो बिहार को कायदे से जानते समझते हैं, बिहार के भूगोल का ज्ञान और बिहारी नेताओं का मनोविज्ञान समझते हैं, वे यह जानते हैं कि प्रदेश के सारे बांध अतिक्रमण में है। बांधों पर लोगों के घर बने हैं। बंधे काट-काट कर खेतों में मिला दिए गए हैं। बांध पशुओं के बांधने और उनका चारा-भूंसा रखने की जगह बन चुके हैं। पशुओं का चारा-भूंसा रखने की वजह से चूहे उन जगहों को पोपला कर चुके हैं। हर साल जब नदियां उफनाती हैं तो उन पोपले स्थानों से मैदान में उतर कर सामाजिक न्याय का खौफनाक दृश्य दिखाती हैं। उसी सामाजिक न्याय का, जिसकी दलीलें देकर लालू जैसे नेता बांधों पर ग्रामीणों के अतिक्रमण को उचित ठहराते रहे हैं और बाढ़ आने पर मीडिया के समक्ष बड़े गौरव बोध से कहते रहे हैं, 'ई बाढ़ आप लोगों के लिए न मौसमी खबर है। ई आता है तो महीना दू महीना ई गांव वाला सब को सब्जी का इंतजाम नहीं न करना पड़ता है। मछली का पूरा इंतजाम रहता है, सब लोग खूब मौज में पिकनिक मनाता है। आप लोग बाढ़-बाढ़ करते रहिए।’ लालू के शासनकाल में बिहार में बाढ़ मछलियां और ग्रामीणों के लिए 'पिकनिक’ लेकर आती है, लेकिन नीतीश के शासन में विपदा। यही बिहार के राजनीतिकों का असली स्तर है। इनसे आप अपेक्षा कर सकते हैं कि ये किसी मुद्दे पर गम्भीर हों, सार्थक बहस में उतर सकें और उसके समाधान का शिद्दत से रास्ता तलाश सकें!
बिहार की नदियों का जायजा लें। शहर के नाम पर स्लम का विस्तार पूरे प्रदेश को ग्रस चुका है। नदियां सिमटती चली गईं। करीब करीब सभी नदियों ने बिहार में अपना पाट छोड़ दिया है। अब पता ही नहीं चलता कि नेताओं के चरित्र की तरह नदियों के पाट कहां खो गए। नदियों के तल मलबों और शहरी व कस्बाई कचरों से भर रहे हैं। तालाब और झीलें रहने के लिए भर कर समतल बना डाली गइं, तो आप क्या सोचते हैं कि नदियों का पानी अपने मूल स्रोत से बढ़ेगा तो कहां जाएगा? पानी को तो बहना ही है, तो वह पूरे बिहार के ऊपर से बहेगा। आप याद करिए, गंगा के किनारे बसी राजधानी पटना का पुराना दृश्य। हहराती लहराती गंगा पटना में कितना मनोरम दृश्य दिखाती थी। हरियाली से घिरे शहर के किनारे गंगा में बड़े बड़े जहाज ऐसे चलते थे जैसे मिसीसीपी नदी, टेम्स या नील नदी में चलते हों। गंगा का पानी ऐसा साफ कि अंजुरी भर कर पी लें। आज बिहारियों के मल-मूत्र से भरी गंगा क्या आपको नहीं दिखती? मिसीसीपी, टेम्स वगैरह तो आज भी अपने मौलिक स्वच्छ स्वरूप में है लेकिन पटना की गंगा कहां सिमट गई, कभी सोचा है इसे? अगर सोचा गया तो क्या इसे कभी मुद्दा बनाया गया? अगर गंगा में बाढ़ आई और सोन नदी को गुस्सा आया तो पटना का क्या होगा। सत्तर के दशक में आई बाढ़ के बाद तो पटना के लोगों ने हर बारिश में ही उतना पानी, उतनी बीमारी और उतनी राजनीतिक बेचारगी झेल ली।
बिहार की बांधें इसलिए जर्जर हैं क्योंकि वहां के लोग जर्जर हैं। बिहार की नदियां मलबे और गंदगियों से इसलिए भरती चली जा रही हैं क्योंकि बिहार के लोग खुद कचरा हैं। बिहार के नेता इसलिए स्खलित हैं क्योंकि हम आप स्खलित हैं। हम हीन हैं। हम सामाजिक न्याय जैसी मक्कार शब्दावलियों की साजिश के शिकार हैं। बिहार के लोगों को कितना न्याय मिल गया, वह सब सामने है। पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र व अन्य राज्य के लोगों को पंजाबी, बंगाली, मराठी वगैरह कहने में गर्व होता है, पर बिहार के लोगों को खुद को बिहारी कहने में शर्म आती है। बिहार के क्षुद्र लीडर बिहार के लोगों में बिहारी होने के ऐतिहासिक गौरवबोध की स्कूलिंग तक नहीं कर पाए, आत्मसम्मान नहीं जाग्रत करा पाए, स्वाभिमान और स्वावलम्बन नहीं दे पाए, रोटी के लिए मारा-मारा फिरने के लिए छोड़ दिया, उस राज्य के लोगों को असम से लेकर महाराष्ट्र तक अपमानित तो होना ही पड़ेगा। यह लालू-कर्पूरी मंडल का सामाजिक न्याय ही तो है। टुकड़ों में विभक्त, टुकड़े के लिए लालायित!
हममें सच स्वीकार करने का माद्दा नहीं। विज्ञान का नियम जीवन पर लागू होता है, कम से कम उसे तो मानें। हम जैसा चरित्र और व्यवहार रखते हैं, करते हैं, प्रकृति वैसा ही व्यवहार और चरित्र हमें प्रत्यावर्तित करती है। आप याद करें वही सहरसा मधेपुरा जहां के लोग आज भीषण बाढ़ से आक्रांत हैं, वहां कभी अस्सी के दशक में बदला घाट रेल हादसा हुआ था। पूरी की पूरी ट्रेन पुल से कोशी नदी में जा गिरी। हजारों लोग मरे थे। महिलाएं बच्चे सब उफनाई कोशी की धार में बह गए थे। कोशी की धार ऐसी कि उसमें गिरे डिब्बे जब बाहर निकाले गए तो वे स्क्रू की तरह घूमे हुए पाए गए थे। हादसे में जो लोग तैर कर जान बचा सकते थे, वे भी नहीं बच पाए। तैर कर किनारे पहुंचने पर मधेपुरा के लोग उन्हें खुरपियों और कुदाल से काट कर मार डालते और उनकी घड़ियां, पैसे और जेवर वगैरह लूट लेते। हैवानियत का नंगा बर्बर दृश्य अब भी लोगों की रूह कंपा देता है। जब पुलिस ने मधेपुरा सहरसा के गांवों में छापामारी की तो घरों में घड़े भर-भर के घड़ियां बरामद की गई थीं। सोने जेवरात और अन्य सामान की तो पूछिए मत। यानी जितनी घड़ियां उतनी हत्याएं की थीं लोगों ने। गांवों में चादरों पर घड़ियां फैला कर सुखाई जाती हुई बरामद की गई थीं। आज वह पूरा इलाका बाढ़ से लबालब है। वही कोशी है और वही उसकी धार है। बात अलग धरा की है लेकिन आधार की है। निराधार नहीं। बिहार में फैली सड़ांध हमारे ही व्यक्तित्वों और कृतित्वों का प्रत्यावर्तन है। बिहार को गर्त में धकेलने वाले नेता भी बिहार के लोगों का ही 'रिफ्लेक्शन’ हैं। सामाजिक न्याय विद्रूप हुआ तो प्राकृतिक न्याय असंतुलित हो गया। प्रतीक्षा के बाद भी बारिश नहीं, अनिच्छा के बावजूद बाढ़। स्खलित सियासत का प्रतिबिम्ब प्राकृतिक-चर्या पर आप साफ-साफ देखिए।
लालू यादव अब इस बात पर कलह कर रहे हैं कि बाढ़ प्रभावित लोग भाग कर राजधानी पटना पहुंचें। लालू इस प्राकृतिक आपदा के समय भी अराजकता भरी सियासत का विस्तार करने का कुचक्र रच रहे हैं। बाढ़ से आक्रांत लोग राजधानी के लोगों को घरों में सुख से रहता हुआ नहीं देख पाएंगे। बिहार के नेता बिहार के लोगों को गृह युद्ध की तरफ या सामूहिक आत्महत्या की तरफ धकेल रहे हैं। परस्पर हत्या या आत्महत्या का एक खौफनाक दौर शुरू होने का अंदेशा गहराता जा रहा है। नेताओं की साजिश इसी बात की है। गिद्धों का भोजन इसी सामूहिक आत्महत्या से चलने वाला है। कफन की दुकानें इसी सामूहिक खुदकुशियों से चल निकलने वाली हैं। इस खौफनाक दौर को हम समय रहते रोक लें, या पक्के बिहारी बने रहें और भुनभुनाते रहें...
हक अच्छा पर उसके लिए कोई और मरे तो और अच्छा
तुम भी कोई मंसूर हो जो सूली पे चढ़ो... खामोश रहो
आंखें मूंद किनारे बैठो, मन के रखो बंद किवाड़
इंशा जी लो धागा ले लो, लब सी लो, खामोश रहो...
बिहार में बाढ़ को लेकर तमाम अखबारों में खबरें आ रही हैं। विजुअल मीडिया भी बिहार की बाढ़ पर पिला पड़ा है। बाढ़ की त्रासदी को लेकर चाहे प्रिंट मीडिया हो या विजुअल मीडिया, दोनों ही अपनी संवेदनशीलता दिखा रहे हैं, या दोनों ही, बाढ़-त्रासदी को बाजार में बेच रहे हैं। बिहार में बाढ़ अभी प्रलय का रूप नहीं ले रही है। लेकिन वह समय भी जल्दी ही आने वाला है जब बिहार केवल भारत के नक्शे की निशानी के बतौर रह जाएगा और वहां कोशी, बागमती और बूढ़ी गंडक जैसी नदियां हहराती हुई गंगा की धार में मिलती बहती दिखेंगी और बिहार तल में होगा। सम्पूर्ण मीडिया बाढ़ के प्रकोप और उससे आक्रांत लोगों की त्रासदी दिखा रहा है, प्रशासनिक नाकामियां और नेपाल की बदमाशियां दिखा रहा है, लेकिन असली जख्म कहां है, मीडिया को दिख नहीं रहा, इसलिए दिखा नहीं रहा। आम फहम बात चलती है कि राजनीतिक रूप से बिहार बहुत ही जागरूक प्रदेश है। लेकिन आप मानें कि बिहार के लोग राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता की दृष्टि से बिल्कुल मूढ़ हैं। उन्हें जागरूक बता-बता कर कुछ नेताओं ने बिहार के लोगों को बेवकूफ बनाया है, उन्हें बेचा है। इतना बेचा कि आज बिहारियों की कोई कीमत और कोई वकत नहीं रह गई। जिस प्रदेश के लोग आजादी के बाद से आज तक अपने सरोकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए, जो अधिकार-अधिकार का प्रलाप करते रहे और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं हो पाए, जिन्हें सड़क-बांध और नदियों-नालों की सुरक्षा के प्रति कोई जागरूक-चिंता नहीं रही, जो जानवर की हद तक जाकर जीने के लिए तैयार होते रहे, उस नागरिक-जमात को जागरूक बताना उसे बेवकूफ बनाना ही तो है। बुद्ध-महावीर की धरती, चाणक्य और चंद्रगुप्त की धरती, अंगराज कर्ण और महावीर जरासंध की धरती, महान अशोक की धरती, वीर कुंअर सिंह की धरती, खुदीराम बोस की धरती, राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण की धरती, दिनकर और गोपाल सिंह नेपाली की धरती... और जाने क्या-क्या बता बता कर इस प्रदेश में मूढ़ता का सुनियोजित सृजन किया गया। पूर्वज हाथी पालते थे, हम हाथी बांधने की जंजीरें भांजने की नितांत मूर्ख हरकतों में लगे हैं। विडम्बना यह है कि बिहार के लोगों को जागरूक बता कर सामाजिक-मूढ़ता का नियोजित विस्तार करने वाले वे सारे 'लीडर’ उत्तर-स्वतंत्रता-काल से लेकर बिहार की सम्पूर्ण क्रांति और सामाजिक न्याय तक के स्वयंभू ठेकेदार हैं। उनके घर बाढ़ में नहीं बहते। उनके बच्चे राहत सामग्री के लिए टकटकी बांधे नहीं रहते। उनके घर की महिलाओं को बाढ़ के पानी में जंघा तक कपड़े उठाए चलने की व्यथा नहीं झेलनी पड़ती। वे हेलीकॉप्टर से फेंकी गई कृपादृष्टि और राहत सामग्री के कातर पात्र नहीं। वे तो उड़नखटोले पर विचरण करते हुए भेंड़-बकरियों के सदृश बिहार के लोगों पर सामाजिक न्याय की समग्र दृष्टि डालते हैं। बात सुनने में कड़वी जरूर है, लेकिन हेलीकॉप्टर में दूरबीन लिए बैठे नेता को हेलीकॉप्टर की चक्रवाती हवा में महिलाओं के उड़ते बिखरते कपड़ों को देखते और कुत्सित मौज लेते मीडिया के न जाने कितने साथियों ने देखा होगा, लेकिन यह उनके लिए मुद्दा नहीं है। बात सुनने और कहने दोनों में कड़वी है, लेकिन इससे कब तक बचेंगे! सच को दबाए रखने और छद्म को उघारे रखने के कारण ही तो बिहार की यह दशा हुई है।
बिहार सम्पूर्ण भ्रांति में घिसटता हुआ भीषण सामाजिक अन्याय का प्रदेश रहा है, रखा गया है और उसे ऐसा ही बनाए रखा जाएगा। आजादी के बाद से अब तक जितने भी 31 मुख्यमंत्री हुए, श्रीकृष्ण सिंह से लेकर कृष्ण वल्लभ सहाय, बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव और नीतीश कुमार तक सब एक ही धूर्त नस्ल के रहे हैं। इनकी मक्कारी के कारण पैदा होती रही सिलसिलेवार वजहों से बिहार आज इस दुर्दशा तक पहुंचा है और विध्वंस की चरम स्थिति तक जल्दी ही पहुंचने वाला है। पूछिए कर्पूरी ठाकुर के समकालीन किसी भी राजनीतिक या समाजसेवी से। अगर वह आपको ईमानदारी से बताए कि कैसे वे चूड़ा-दही जीम कर सुबह-सुबह पिछले दरवाजे से निकल जाते थे। अपने कुर्ते की जेब में दतवन [दातुन] रखते थे। उनके घर जनता का जमावड़ा लग जाता तो करीब बारह-एक बजे वे सामने के रास्ते से परेशान-हाल दतवन करते पैदल आते दिखते। जनता स्तब्ध उन्हें देखती रहती और कर्पूरी जी उन्हें समझाते, 'आप ही लोगों के काम में सुबह से लगा रहता हूं, मुंह तक धोने का टाइम नहीं मिलता।’ चमत्कृत लोग अपनी बात बताना भी भूल जाते और फिर भी प्रभावित होकर जाते कि लीडर जनता के काम में इतना व्यस्त है कि दोपहर तक मुंह भी नहीं धो पाता। इस तरह के नियोजित छद्म से ही बिहार के नेताओं की दुकानें चलती रही हैं। जब जननायकों की छवि वाले लीडरों का यह असली चेहरा था तो लालू-नीतीश जैसे नेताओं के आडम्बर के स्तर के बारे में एक बिहारी क्या समस्त देशवासी आसानी से समझ सकता है। लालू-राबड़ी शासनकाल में सड़कों की दुर्दशा के बारे में उनसे पूछा जाता था, तो लालू सामाजिक न्याय की नायाब परिभाषाएं रचते थे। पक्की सड़क को सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतीक बताते थे और लोगों को सावधान करते थे कि पक्की सड़कें बनीं तो पुलिस गांव तक पहुंच जाएगी। बिहार के विकास-पुरूष लालू पक्की सड़क और ठोस ढांचे का विरोध करते हुए, चारा खाते हुए अपना ढांचा ठोस करने में कामयाब रहे। ललित नारायण मिश्र की हत्या पर चुप्पी साधे रहने के एवज में मुख्यमंत्री का पद पाए शिक्षक डॉ. जगन्नाथ मिश्र की वैभव यात्रा, फुलवारीशरीफ के पशुपालन विभाग के सीलन भरे कमरे में जिंदगी जीने वाले निम्न दर्जे के छात्र रहे लालू यादव और राजेंद्र नगर से कंकड़बाग तक किराए का कमरा ढूंढ़ने वाले नीतीश कुमार के भौतिक उठान और चारित्रिक गिरान का ग्राफ आपको बिहार की सड़कों और बांधों के जर्जर होने की कहानी तो बता ही रहा है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण कहता है कि प्रखरता और मूढ़ता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 'इंटेलिजेंस’ और 'इडियॉसी’ दोनों साथ-साथ ही चलती है। बिहार में 'इंटेलिजेंस’ का दौर कभी था। अभी 'इडियॉसी’ का दौर चल रहा है। या कहें 'इंटेलिजेंस’ आजादी के बाद बिहार पर राज करने वाले राजनीतिकों के ठेके में रही और 'इडियॉसी’ बिहार के आम आदमी के मत्थे मढ़ी जाती रही। बिहार में बाढ़ मुद्दा जरूर है। लेकिन आप बताएं कि बिहार में क्या मुद्दा नहीं है। यह अलग बात है कि मुद्दा बनता नहीं है। क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बाढ़ से राहत दिलाने में असमर्थता जताना राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है? अपने शासन के लम्बे 15 अराजक साल भूल कर नीतीश कुमार पर लालू यादव का कटाक्ष करना क्या मुद्दा नहीं? नेपाल की तरफ से कोशी का पानी लगातार छोड़े जाने के कृत्य के खिलाफ केंद्र सरकार का कूटनीतिक हस्तक्षेप न करना क्या मुद्दा नहीं है? 31 मुख्यमंत्रियों से बिहार के विकास और उनके व्यक्तिगत विकास का फर्क पूछने और पाई-पाई हिसाब लिए जाने का मुद्दा न तो कभी मीडिया को दिखा है और न धंधा करने वाले सामाजिक संगठनों को। बिहार में तमाम किस्म की अधोवृत्तियां कर रही राजनीतिक पार्टियों से तो कुछ सकारात्मक लोकतांत्रिक अपेक्षा रखना वैसा ही है जैसे बिहारियों को बहुत जागरूक बता कर लल्लू का उल्लू साधना। बिहार की इस नकारात्मक विकास-यात्रा के संवाहक लीडरों में इतनी भी पुंसकता नहीं कि वे इस पर सार्थक बहस में उतरने का साहस करें। वे बहस में उतरने का केवल स्वांग भरते हैं। दरअसल वे बहस में नहीं, कलह में उतरते हैं। एक दूसरे को गरियाते हैं। बेटी-रोटी करते हैं या कमजोर पड़ने पर हास्य अभिनेता के भौंडे रोल में उतरने से जरा भी नहीं हिचकते। बाढ़ तो बिहार के लिए मौसम की तरह है। आजादी के बाद से आज तक बांधों की कोई देखरेख नहीं हुई। अब तक 31 मुख्यमंत्री आए और गए। जो बिहार को कायदे से जानते समझते हैं, बिहार के भूगोल का ज्ञान और बिहारी नेताओं का मनोविज्ञान समझते हैं, वे यह जानते हैं कि प्रदेश के सारे बांध अतिक्रमण में है। बांधों पर लोगों के घर बने हैं। बंधे काट-काट कर खेतों में मिला दिए गए हैं। बांध पशुओं के बांधने और उनका चारा-भूंसा रखने की जगह बन चुके हैं। पशुओं का चारा-भूंसा रखने की वजह से चूहे उन जगहों को पोपला कर चुके हैं। हर साल जब नदियां उफनाती हैं तो उन पोपले स्थानों से मैदान में उतर कर सामाजिक न्याय का खौफनाक दृश्य दिखाती हैं। उसी सामाजिक न्याय का, जिसकी दलीलें देकर लालू जैसे नेता बांधों पर ग्रामीणों के अतिक्रमण को उचित ठहराते रहे हैं और बाढ़ आने पर मीडिया के समक्ष बड़े गौरव बोध से कहते रहे हैं, 'ई बाढ़ आप लोगों के लिए न मौसमी खबर है। ई आता है तो महीना दू महीना ई गांव वाला सब को सब्जी का इंतजाम नहीं न करना पड़ता है। मछली का पूरा इंतजाम रहता है, सब लोग खूब मौज में पिकनिक मनाता है। आप लोग बाढ़-बाढ़ करते रहिए।’ लालू के शासनकाल में बिहार में बाढ़ मछलियां और ग्रामीणों के लिए 'पिकनिक’ लेकर आती है, लेकिन नीतीश के शासन में विपदा। यही बिहार के राजनीतिकों का असली स्तर है। इनसे आप अपेक्षा कर सकते हैं कि ये किसी मुद्दे पर गम्भीर हों, सार्थक बहस में उतर सकें और उसके समाधान का शिद्दत से रास्ता तलाश सकें!
बिहार की नदियों का जायजा लें। शहर के नाम पर स्लम का विस्तार पूरे प्रदेश को ग्रस चुका है। नदियां सिमटती चली गईं। करीब करीब सभी नदियों ने बिहार में अपना पाट छोड़ दिया है। अब पता ही नहीं चलता कि नेताओं के चरित्र की तरह नदियों के पाट कहां खो गए। नदियों के तल मलबों और शहरी व कस्बाई कचरों से भर रहे हैं। तालाब और झीलें रहने के लिए भर कर समतल बना डाली गइं, तो आप क्या सोचते हैं कि नदियों का पानी अपने मूल स्रोत से बढ़ेगा तो कहां जाएगा? पानी को तो बहना ही है, तो वह पूरे बिहार के ऊपर से बहेगा। आप याद करिए, गंगा के किनारे बसी राजधानी पटना का पुराना दृश्य। हहराती लहराती गंगा पटना में कितना मनोरम दृश्य दिखाती थी। हरियाली से घिरे शहर के किनारे गंगा में बड़े बड़े जहाज ऐसे चलते थे जैसे मिसीसीपी नदी, टेम्स या नील नदी में चलते हों। गंगा का पानी ऐसा साफ कि अंजुरी भर कर पी लें। आज बिहारियों के मल-मूत्र से भरी गंगा क्या आपको नहीं दिखती? मिसीसीपी, टेम्स वगैरह तो आज भी अपने मौलिक स्वच्छ स्वरूप में है लेकिन पटना की गंगा कहां सिमट गई, कभी सोचा है इसे? अगर सोचा गया तो क्या इसे कभी मुद्दा बनाया गया? अगर गंगा में बाढ़ आई और सोन नदी को गुस्सा आया तो पटना का क्या होगा। सत्तर के दशक में आई बाढ़ के बाद तो पटना के लोगों ने हर बारिश में ही उतना पानी, उतनी बीमारी और उतनी राजनीतिक बेचारगी झेल ली।
बिहार की बांधें इसलिए जर्जर हैं क्योंकि वहां के लोग जर्जर हैं। बिहार की नदियां मलबे और गंदगियों से इसलिए भरती चली जा रही हैं क्योंकि बिहार के लोग खुद कचरा हैं। बिहार के नेता इसलिए स्खलित हैं क्योंकि हम आप स्खलित हैं। हम हीन हैं। हम सामाजिक न्याय जैसी मक्कार शब्दावलियों की साजिश के शिकार हैं। बिहार के लोगों को कितना न्याय मिल गया, वह सब सामने है। पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र व अन्य राज्य के लोगों को पंजाबी, बंगाली, मराठी वगैरह कहने में गर्व होता है, पर बिहार के लोगों को खुद को बिहारी कहने में शर्म आती है। बिहार के क्षुद्र लीडर बिहार के लोगों में बिहारी होने के ऐतिहासिक गौरवबोध की स्कूलिंग तक नहीं कर पाए, आत्मसम्मान नहीं जाग्रत करा पाए, स्वाभिमान और स्वावलम्बन नहीं दे पाए, रोटी के लिए मारा-मारा फिरने के लिए छोड़ दिया, उस राज्य के लोगों को असम से लेकर महाराष्ट्र तक अपमानित तो होना ही पड़ेगा। यह लालू-कर्पूरी मंडल का सामाजिक न्याय ही तो है। टुकड़ों में विभक्त, टुकड़े के लिए लालायित!
हममें सच स्वीकार करने का माद्दा नहीं। विज्ञान का नियम जीवन पर लागू होता है, कम से कम उसे तो मानें। हम जैसा चरित्र और व्यवहार रखते हैं, करते हैं, प्रकृति वैसा ही व्यवहार और चरित्र हमें प्रत्यावर्तित करती है। आप याद करें वही सहरसा मधेपुरा जहां के लोग आज भीषण बाढ़ से आक्रांत हैं, वहां कभी अस्सी के दशक में बदला घाट रेल हादसा हुआ था। पूरी की पूरी ट्रेन पुल से कोशी नदी में जा गिरी। हजारों लोग मरे थे। महिलाएं बच्चे सब उफनाई कोशी की धार में बह गए थे। कोशी की धार ऐसी कि उसमें गिरे डिब्बे जब बाहर निकाले गए तो वे स्क्रू की तरह घूमे हुए पाए गए थे। हादसे में जो लोग तैर कर जान बचा सकते थे, वे भी नहीं बच पाए। तैर कर किनारे पहुंचने पर मधेपुरा के लोग उन्हें खुरपियों और कुदाल से काट कर मार डालते और उनकी घड़ियां, पैसे और जेवर वगैरह लूट लेते। हैवानियत का नंगा बर्बर दृश्य अब भी लोगों की रूह कंपा देता है। जब पुलिस ने मधेपुरा सहरसा के गांवों में छापामारी की तो घरों में घड़े भर-भर के घड़ियां बरामद की गई थीं। सोने जेवरात और अन्य सामान की तो पूछिए मत। यानी जितनी घड़ियां उतनी हत्याएं की थीं लोगों ने। गांवों में चादरों पर घड़ियां फैला कर सुखाई जाती हुई बरामद की गई थीं। आज वह पूरा इलाका बाढ़ से लबालब है। वही कोशी है और वही उसकी धार है। बात अलग धरा की है लेकिन आधार की है। निराधार नहीं। बिहार में फैली सड़ांध हमारे ही व्यक्तित्वों और कृतित्वों का प्रत्यावर्तन है। बिहार को गर्त में धकेलने वाले नेता भी बिहार के लोगों का ही 'रिफ्लेक्शन’ हैं। सामाजिक न्याय विद्रूप हुआ तो प्राकृतिक न्याय असंतुलित हो गया। प्रतीक्षा के बाद भी बारिश नहीं, अनिच्छा के बावजूद बाढ़। स्खलित सियासत का प्रतिबिम्ब प्राकृतिक-चर्या पर आप साफ-साफ देखिए।
लालू यादव अब इस बात पर कलह कर रहे हैं कि बाढ़ प्रभावित लोग भाग कर राजधानी पटना पहुंचें। लालू इस प्राकृतिक आपदा के समय भी अराजकता भरी सियासत का विस्तार करने का कुचक्र रच रहे हैं। बाढ़ से आक्रांत लोग राजधानी के लोगों को घरों में सुख से रहता हुआ नहीं देख पाएंगे। बिहार के नेता बिहार के लोगों को गृह युद्ध की तरफ या सामूहिक आत्महत्या की तरफ धकेल रहे हैं। परस्पर हत्या या आत्महत्या का एक खौफनाक दौर शुरू होने का अंदेशा गहराता जा रहा है। नेताओं की साजिश इसी बात की है। गिद्धों का भोजन इसी सामूहिक आत्महत्या से चलने वाला है। कफन की दुकानें इसी सामूहिक खुदकुशियों से चल निकलने वाली हैं। इस खौफनाक दौर को हम समय रहते रोक लें, या पक्के बिहारी बने रहें और भुनभुनाते रहें...
हक अच्छा पर उसके लिए कोई और मरे तो और अच्छा
तुम भी कोई मंसूर हो जो सूली पे चढ़ो... खामोश रहो
आंखें मूंद किनारे बैठो, मन के रखो बंद किवाड़
इंशा जी लो धागा ले लो, लब सी लो, खामोश रहो...
Sunday, August 31, 2008
बिहार में नहीं मिली है रोजगार की गारंटी
कुमार नरोत्तम / नई दिल्ली July 23, 2008
पंजाब में इस साल धान की रोपाई में बिहार के मजदूरों की भारी कमी देखी गई। इसका श्रेय लेते हुए बिहार सरकार ने कहा है कि मजदूरों को अपने राज्य में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे वे अब काम के लिए बाहर जाने को मजबूर नहीं हैं।
सरकार ने इस बात का भी दावा किया कि राज्य सरकार की योजनाओं सहित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराया जा रहा है। लेकिन ये सारे दावे कागजी ही नजर आते हैं। असली तस्वीर कुछ और हैं।
बेरोजगारों को सौ दिन का रोजगार देने वाली योजना राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) नाकाम साबित हो रही है। इस योजना के अंतर्गत सवा दो वर्षों में एक प्रतिशत से भी कम जॉब कार्डधारियों को सौ दिन का रोजगार उपलब्ध हो पाया है। इस योजना के तहत इस बात का भी प्रावधान है कि अगर जॉब कार्डधारियों को सौ दिन का रोजगार नहीं मिल पाता है, तो उसे बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा, लेकिन काम नहीं पाने वाले बेरोजगारों और जॉब कार्डधारियों को यह भत्ता भी नसीब नहीं हुआ है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह इसके लिए राज्य सरकार को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि नरेगा के कार्यान्वयन में बिहार फिसड्डी साबित हो रहा है। इस पर बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा का कहना है कि नरेगा के अंतर्गत लोगों ने काम की मांग की ही नही, तो उन्हें कहां से काम दिया जाएगा। जिन लोगों ने काम की मांग की है, उन्हें रोजगार मिला है। मंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक योजना के सवा दो वर्ष बीत जाने के बाद जॉब कार्डधारियों की संख्या में सात गुणा बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2006-07 में जॉब कार्डधारियों की संख्या 12.56 लाख थी। वर्ष 2007-08 में कार्डधारियों की संख्या बढ़कर 45.64 लाख हो गई। वर्ष 2008-09 के पहले तीन महीनों में जॉब कार्डधारियों की संख्या 87.51 लाख हो गई। लेकिन इन सवा दो वर्षों में केवल 70,025 परिवारों ने ही नरेगा के तहत सौ दिनों तक काम किया। इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में मात्र 2554 परिवारों, वर्ष 2007-08 के दौरान 37,119 परिवारों और वर्ष 2006-07 में 30352 परिवारों को ही सौ दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया।
जॉब कार्डधारियों और सौ दिनों का रोजगार मिलने वाले परिवारों की संख्या में भारी अंतर होने के मुद्दे पर राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि जॉब कार्डधारियों ने रोजगार की मांग की ही नही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2007-08 में 16.21 लाख जॉब कार्डधारियों ने काम करने की मांग की और 16.08 लाख लोगों को काम मिला।
एक तरफ तो मंत्री का कहना है कि 16 लाख जॉब कार्डधारी काम करने को इच्छुक हैं और दूसरी तरफ 37 हजार लोगों को रोजगार मिल पा रहा है। विभागीय मंत्री कहते हैं कि बहुत सारे गांव वाले जॉब कार्ड बन जाने का मतलब नौकरी मिलना समझने लगते हैं। उनसे अगर मिट्टी कटाई का कोई काम करने को कहा जाता है, तो वे इस तरह का काम करना नहीं चाहते। ऐसे हालात में रोजगार देने में दिक्कत आती है।
पंजाब में इस साल धान की रोपाई में बिहार के मजदूरों की भारी कमी देखी गई। इसका श्रेय लेते हुए बिहार सरकार ने कहा है कि मजदूरों को अपने राज्य में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे वे अब काम के लिए बाहर जाने को मजबूर नहीं हैं।
सरकार ने इस बात का भी दावा किया कि राज्य सरकार की योजनाओं सहित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत लाखों लोगों को रोजगार मुहैया कराया जा रहा है। लेकिन ये सारे दावे कागजी ही नजर आते हैं। असली तस्वीर कुछ और हैं।
बेरोजगारों को सौ दिन का रोजगार देने वाली योजना राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) नाकाम साबित हो रही है। इस योजना के अंतर्गत सवा दो वर्षों में एक प्रतिशत से भी कम जॉब कार्डधारियों को सौ दिन का रोजगार उपलब्ध हो पाया है। इस योजना के तहत इस बात का भी प्रावधान है कि अगर जॉब कार्डधारियों को सौ दिन का रोजगार नहीं मिल पाता है, तो उसे बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा, लेकिन काम नहीं पाने वाले बेरोजगारों और जॉब कार्डधारियों को यह भत्ता भी नसीब नहीं हुआ है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह इसके लिए राज्य सरकार को दोषी मानते हैं। उनका कहना है कि नरेगा के कार्यान्वयन में बिहार फिसड्डी साबित हो रहा है। इस पर बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा का कहना है कि नरेगा के अंतर्गत लोगों ने काम की मांग की ही नही, तो उन्हें कहां से काम दिया जाएगा। जिन लोगों ने काम की मांग की है, उन्हें रोजगार मिला है। मंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक योजना के सवा दो वर्ष बीत जाने के बाद जॉब कार्डधारियों की संख्या में सात गुणा बढ़ोतरी हुई है।
वर्ष 2006-07 में जॉब कार्डधारियों की संख्या 12.56 लाख थी। वर्ष 2007-08 में कार्डधारियों की संख्या बढ़कर 45.64 लाख हो गई। वर्ष 2008-09 के पहले तीन महीनों में जॉब कार्डधारियों की संख्या 87.51 लाख हो गई। लेकिन इन सवा दो वर्षों में केवल 70,025 परिवारों ने ही नरेगा के तहत सौ दिनों तक काम किया। इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में मात्र 2554 परिवारों, वर्ष 2007-08 के दौरान 37,119 परिवारों और वर्ष 2006-07 में 30352 परिवारों को ही सौ दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया गया।
जॉब कार्डधारियों और सौ दिनों का रोजगार मिलने वाले परिवारों की संख्या में भारी अंतर होने के मुद्दे पर राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि जॉब कार्डधारियों ने रोजगार की मांग की ही नही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2007-08 में 16.21 लाख जॉब कार्डधारियों ने काम करने की मांग की और 16.08 लाख लोगों को काम मिला।
एक तरफ तो मंत्री का कहना है कि 16 लाख जॉब कार्डधारी काम करने को इच्छुक हैं और दूसरी तरफ 37 हजार लोगों को रोजगार मिल पा रहा है। विभागीय मंत्री कहते हैं कि बहुत सारे गांव वाले जॉब कार्ड बन जाने का मतलब नौकरी मिलना समझने लगते हैं। उनसे अगर मिट्टी कटाई का कोई काम करने को कहा जाता है, तो वे इस तरह का काम करना नहीं चाहते। ऐसे हालात में रोजगार देने में दिक्कत आती है।
नेपाल के बांध रोकेंगे बिहार की बाढ़
कुमार नरोत्तम / नई दिल्ली August 03, 2008
बाढ़ की विभीषिका से बिहार परेशान है। जाहिर सी बात है कि बाढ़ की बेकाबू स्थिति से मुख्यमंत्री सचिवालय भी हलकान है।
राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब नेपाल में ऊंचे बांध बनाकर इस समस्या का स्थायी हल तलाशने की कवायद में जुटे हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अधिकारी ने बताया कि यदि नेपाल में बांध बनाए जाते हैं तो इससे बिजली भी मिलेगी और नेपाल के तराई क्षेत्रों में सिंचाई की समस्या भी हल हो जाएगी।
पूर्वी नेपाल की सप्तकोशी बहुद्देश्यीय परियोजना से बिहार के बाढ़ की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, लेकिन यह क्रांति राष्ट्रीय मोर्चा (माओवादी से संबद्ध) के विरोध के कारण खटाई में पड़ गया है। मालूम हो कि नेपाल के साथ कई पनबिजली परियोजनाओं में बहुत सारी भारतीय कंपनियों ने रुचि दिखाई है।
नेपाल में टाटा ग्रुप सहित 10 भारतीय कंपनियां तीसरे बिजली परियोजना को हासिल करने की होड़ में शामिल है। जीएमआर ग्रुप ने तो 300 अपर कर्णाली पनबिजली परियोजना हासिल भी कर ली है। इसके साथ सतलज जल विद्युत निगम ने 402 अरुण-3 प्रोजेक्ट पर कब्जा जमाया है। इन परियोजनाओं से यह आशा की जा सकती है नेपाल में ऊंचे बांध का निर्माण हो सकता है। पिछले सप्ताह नीतीश कुमार ने बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों के दौरे के पश्चात मुख्यमंत्री ने नेपाल की सीमा रेखा के नजदीक बीरपुर (सुपौल जिला) के स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की।
इस बैठक में कोशी प्रमंडल के आयुक्त यू के नंदा सहित मधेपुरा, सुपौल, सहरसा और अररिया जिले के जिला मजिस्ट्रेट भी शामिल हुए। बैठक के बाद उन्होंने कहा कि बाढ़ की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सभी सुरक्षा उपायों पर काम किया जा रहा है, हालांकि स्र्थाई समाधान तो नेपाल में बांध बनाकर ही निकाला जा सकता है। लेकिन कुल मिलाकर स्थिति यह है कि बिहार में बाढ़ की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आ रहा है। राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि बाढ़ से कटिहार, नालंदा, वैशाली, पटना, मुजफ्फरपुर, सुपौल, सहरसा आदि जिलों के 540 गांवों के 4 लाख लोग प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि बाढ़ से 775 घर पूरी तरह से तबाह हो गए और इससे लगभग 40 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। केंद्रीय मुख्यमंत्री सचिवालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए राज्य सरकार काम कर रही है। इस बाबत नेपाल पर ऊंचे बांध बनाए जाने की दिशा में होने वाली बातचीत भी शामिल है। हालांकि नेपाल के साथ इस प्रकार का कोई समझौता केंद्रीय हस्तक्षेप के बगैर संभव नही है। इस संबंध में केंद्र से भी बातचीत की जाएगी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार इस मसले को काफी गंभीरता से ले रही है। संभव है कि इस संबंध में एक उच्च स्तरीय समिति प्रधानमंत्री से मिलकर नेपाल के साथ मामले की गंभीरता को लेकर बात करे।
बाढ़ की विभीषिका से बिहार परेशान है। जाहिर सी बात है कि बाढ़ की बेकाबू स्थिति से मुख्यमंत्री सचिवालय भी हलकान है।
राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब नेपाल में ऊंचे बांध बनाकर इस समस्या का स्थायी हल तलाशने की कवायद में जुटे हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अधिकारी ने बताया कि यदि नेपाल में बांध बनाए जाते हैं तो इससे बिजली भी मिलेगी और नेपाल के तराई क्षेत्रों में सिंचाई की समस्या भी हल हो जाएगी।
पूर्वी नेपाल की सप्तकोशी बहुद्देश्यीय परियोजना से बिहार के बाढ़ की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, लेकिन यह क्रांति राष्ट्रीय मोर्चा (माओवादी से संबद्ध) के विरोध के कारण खटाई में पड़ गया है। मालूम हो कि नेपाल के साथ कई पनबिजली परियोजनाओं में बहुत सारी भारतीय कंपनियों ने रुचि दिखाई है।
नेपाल में टाटा ग्रुप सहित 10 भारतीय कंपनियां तीसरे बिजली परियोजना को हासिल करने की होड़ में शामिल है। जीएमआर ग्रुप ने तो 300 अपर कर्णाली पनबिजली परियोजना हासिल भी कर ली है। इसके साथ सतलज जल विद्युत निगम ने 402 अरुण-3 प्रोजेक्ट पर कब्जा जमाया है। इन परियोजनाओं से यह आशा की जा सकती है नेपाल में ऊंचे बांध का निर्माण हो सकता है। पिछले सप्ताह नीतीश कुमार ने बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों के दौरे के पश्चात मुख्यमंत्री ने नेपाल की सीमा रेखा के नजदीक बीरपुर (सुपौल जिला) के स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की।
इस बैठक में कोशी प्रमंडल के आयुक्त यू के नंदा सहित मधेपुरा, सुपौल, सहरसा और अररिया जिले के जिला मजिस्ट्रेट भी शामिल हुए। बैठक के बाद उन्होंने कहा कि बाढ़ की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सभी सुरक्षा उपायों पर काम किया जा रहा है, हालांकि स्र्थाई समाधान तो नेपाल में बांध बनाकर ही निकाला जा सकता है। लेकिन कुल मिलाकर स्थिति यह है कि बिहार में बाढ़ की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आ रहा है। राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि बाढ़ से कटिहार, नालंदा, वैशाली, पटना, मुजफ्फरपुर, सुपौल, सहरसा आदि जिलों के 540 गांवों के 4 लाख लोग प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि बाढ़ से 775 घर पूरी तरह से तबाह हो गए और इससे लगभग 40 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। केंद्रीय मुख्यमंत्री सचिवालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए राज्य सरकार काम कर रही है। इस बाबत नेपाल पर ऊंचे बांध बनाए जाने की दिशा में होने वाली बातचीत भी शामिल है। हालांकि नेपाल के साथ इस प्रकार का कोई समझौता केंद्रीय हस्तक्षेप के बगैर संभव नही है। इस संबंध में केंद्र से भी बातचीत की जाएगी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार इस मसले को काफी गंभीरता से ले रही है। संभव है कि इस संबंध में एक उच्च स्तरीय समिति प्रधानमंत्री से मिलकर नेपाल के साथ मामले की गंभीरता को लेकर बात करे।
Subscribe to:
Posts (Atom)