कोसी का कहर
कुमार नरोत्तम / August 28, 2008
विलायत अकेला हो गया है। कल तक उसके परिवार में 15 लोग थे, मां थी, बच्चे थे, पत्नी थी और भाई भी था।
अपने घर बिहार के सुपौल जिले से कोसों दूर वह इसी परिवार की खुशियों को संजोए रखने के लिए दिल्ली में रेहड़ी लगाकर फल बेचा करता है। जैसे-तैसे कुछ पैसे जमाकर वह रोज अपने परिवार वालों से फोन के जरिये बात भी कर लेता था।
उसे कभी भी अपने परिवार से दूर रहने का एहसास नहीं हुआ था। लेकिन आज न तो फोन की घंटी बज रही है और न ही परिजनों की कोई खबर लग रही है। उसकी डबडबाती आंखे यह कह जाती है कि कोसी के कहर ने उसके परिवार की खुशियां ही शायद लील न ली हो। फिलवक्त उसके परिजनों का कोई अता-पता नहीं चल रहा है। यही हाल कमोबेश उन हर लोगों का है, जिनके परिजन बाढ़ में फंसे हुए हैं।
कोसी के पानी का कहर बदस्तूर जारी है। ऐसे में लोग अपनी जिंदगी को पानी में बहता हुआ देख रहे हैं। हर रोज पानी का स्तर बढ़ता जा रहा है। लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की जा रही है। आलम यह है कि सहरसा और आसपास की सड़कों पर यातायात खुले होने के बावजूद आवागमन का कोई साधन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। गांव वाले अपने साथ माल-मवेशी लेकर भी भाग रहे हैं।
लोगों को जो साधन मिल रहे हैं, वे उसी के सहारे जान बचाकर भागने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रैक्टर, ट्रक, बस, ठेला आदि यातायात साधनों को काफी इस्तेमाल किया जा रहा है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक अभी पिछले दिनों से लगभग डेढ़ लाख क्यूसेक पानी कोसी नदी से आ रही थी। पिछला रिकॉर्ड अधिकतम 5 से 6 लाख क्यूसेक पानी छोड़ने का रहा है।
दूसरी ओर पूरब में तटबंधों के बीच अधिकतम 10 किलोमीटर का विस्तार क्षेत्र कोसी नदी को प्राप्त था, जो अब बढ़कर 25 किलोमीटर हो गया है। इस तरह अगर 5 या 6 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा जाता है, तो भी अधिक विस्तार क्षेत्र होने के कारण जलग्रहण क्षमता बढ़ी है और एक से डेढ़ फीट अधिक ऊंची पानी आने की आशंका बनती है। इस वजह से लोग बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं।
कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां कोसी की तेज रफ्तार होने की वजह से नाव भी नहीं पहुंच पा रहा है। कई इलाके में पानी के तेज बहाव के साथ मोबाइल के टावर भी बह गए हैं। इन इलाके में लोगों के लिए बाहर रह रहे अपने परिजनों से संपर्क साधित कर पाना पूरी तरह से अवरूद्ध हो गया है। दूसरी तरफ बाढ़ पीड़ितों के वे परिजन, जो बाहर रहते हैं, संपर्क साधित नहीं होने की वजह से काफी चिंतित हैं।
बाढ़ पीड़ित इलाके में बिजली की स्थिति काफी दयनीय हो गई है। ज्यादातर इलाकों में पानी बढ़ने की वजह से बिजली की आपूर्ति रोक दी गई है, ताकि किसी प्रकार की लोड शेडिंग की घटना से बचा जा सके। बिजली की आपूर्ति नहीं होने की वजह से मोबाइल धारी लोग अपना मोबाइल चार्ज नहीं कर पा रहे हैं। इस वजह से किसी से संपर्क स्थापित नहीं हो पा रहा है।
कुछ जगहों से ऐसी भी खबर आई है कि ट्रैक्टरों और ट्रकों पर जेनरेटर लगाकर गांव गांव जाकर मोबाइल आदि को चार्ज किया जा रहा है, ताकि लोगों की मोबाइल कनेक्टिविटी बनी रहे। दिल्ली में रह रहे बाढ़ पीड़ितों के परिजन भी बेहाल हैं। लक्ष्मी नगर के एक टेलीफोन बूथ पर फोन करने आए रमेश (सुपौल के निवासी) अपने परिवार जनों से संपर्क स्थापित नहीं होने की वजह से काफी चिंतित हैं।
वे कहते हैं, मेरा गांव पूरी तरह से पानी में डूबा हुआ है । पिछले दो दिनों से मैं अपने परिवार वालों से संपर्क साधने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन संपर्क नहीं हो पा रहा है। वे कहां हैं और किस हालत में हैं, ये सोचकर मेरा मन घबरा रहा है। शकरपुर स्कूल ब्लॉक बस स्टॉप की रेहड़ी पर ठेला लगाकर अमरुद बेचने वाला बिहार का निवासी भोला राम (अररिया का निवासी) भी अपने घरवालों की कोई खबर नहीं मिलने के कारण परेशान है।
गौरतलब है कि ग्रामीण इलाकों में पानी की तेज रफ्तार के कारण बीएसएनएल की सेवा भी पूर्णत: बाधित हो गई है। जाहिर तौर पर बाढ़ में फंसे लोगों की हालत तो मुहाल है हीं, बाहर रहने वाले उनके परिजन भी कोई खोज-खबर न मिलने की वजह से बेहाल हैं।
Sunday, August 31, 2008
Friday, May 2, 2008
महंगाई की दर बढ़कर 7.57 फीसदी पर
02 मई 2008
सरकार की तमाम कोशिशों को धता बताते हुए महंगाई की दर, 19 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में बढ़कर 7.57 फीसदी हो गई है। इसके पिछले हफ्ते में यह 7.33 फीसदी पर थी। यह लगातार पांचवा हफ्ता है जब महंगाई की दर सात फीसदी के ऊपर दर्ज की गई है।
मुद्रास्फीति की आज घोषित यह दर पिछले साढ़े तीन सालों में सबसे ज्यादा है। एक हफ्ते में सभी उत्पाद के दाम 0.03 फीसदी बढ़े। हालांकि फल व सब्जियों के दाम कुछ नियंत्रित होते दिखे।
सरकार ने बढ़ती मंहगाई को काबू में करने के लिए कमर कसते हुए पिछले महीने की शुरुआत में खाद्य तेलों के आयात शुल्क में भारी कटौती करने की घोषणा के साथ-साथ चावल तथा दाल के निर्यात पर पाबंदी सख्त करने का फैसला किया था। मक्के की उपलब्धता बढ़ाने के लिए इसके आयात पर शुल्क भी समाप्त कर दिया गया था।
लेकिन इन फैसलों का बड़ा असर असल कीमतों पर पड़ता नहीं दिख रहा है।
सरकार की तमाम कोशिशों को धता बताते हुए महंगाई की दर, 19 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में बढ़कर 7.57 फीसदी हो गई है। इसके पिछले हफ्ते में यह 7.33 फीसदी पर थी। यह लगातार पांचवा हफ्ता है जब महंगाई की दर सात फीसदी के ऊपर दर्ज की गई है।
मुद्रास्फीति की आज घोषित यह दर पिछले साढ़े तीन सालों में सबसे ज्यादा है। एक हफ्ते में सभी उत्पाद के दाम 0.03 फीसदी बढ़े। हालांकि फल व सब्जियों के दाम कुछ नियंत्रित होते दिखे।
सरकार ने बढ़ती मंहगाई को काबू में करने के लिए कमर कसते हुए पिछले महीने की शुरुआत में खाद्य तेलों के आयात शुल्क में भारी कटौती करने की घोषणा के साथ-साथ चावल तथा दाल के निर्यात पर पाबंदी सख्त करने का फैसला किया था। मक्के की उपलब्धता बढ़ाने के लिए इसके आयात पर शुल्क भी समाप्त कर दिया गया था।
लेकिन इन फैसलों का बड़ा असर असल कीमतों पर पड़ता नहीं दिख रहा है।
Thursday, May 1, 2008
वसुधैव आहार संकटम्
अब चिंता की कोई बात नहीं है। फोटू कमिटी के सामने महंगाई का विरोध करने वालों को जान लेना चाहिए कि अब महंगाई भारत की समस्या नहीं रही। चूंकि अब यह विश्व की समस्या है, इसलिए भारत में इसका हौव्वा भी नहीं खड़ा करना चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री ने कहा भी कि इसका हौव्वा खड़ा करने से मुनाफाखोरों–कालाबाजारियों को मदद मिलती है।
बाजार के युग में कहां सरकार कोई कार्रवाई कर सकती है इन पर। फिर अब तो यह आहार संकट भ्रष्टाचार के समान विश्वच्यापी हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने इसे विश्व सकंट मान लिया है।
हमारा अपना बस तो हमारी पंचायत पर तो चलता है नहीं, फिर विश्व को हम क्या राह दिखाएं। जबकि ऐसे मौकों पर दुनिया को रास्ता दिखाना हमारा जिम्मेदारी है। विश्व के सबसे बड़े मॉल में अमेरिका में भी बड़ी उलझन है कि वह विश्व को कौन सी राह दिखाए। अब अमेरिकी डेमोक्रेट एक अश्वेत और औरत में तो फैसला कर नहीं पा रहे हैं। फिर आहार संकट पर कैसे फैसला कर पाएंगे।
पर यही क्या कम बड़ी बात है कि दुनिया भर में खाने पीने की चीजें 40 फीसदी महंगी हो गईं हैं। हमारा देश भी दुनिया में ही है। हम भी संसार के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहे हैं।
हम हिंदुस्तानी बड़े ही स्वार्थी और अवसरवादी लोग हैं। हमें हर चीज मुफ्त में चाहिए। यह नहीं समझते कि सामान की बढ़ी हुई कीमत आपके स्टैंडर्ड ऑफ लीविंग को भी तो दर्शाती हैं। अगर इस नजरिए से देखेंगे तो महंगाई आपको तरक्की और प्रगति की पहचान भी दिखेगी।
हमेशा याद रखिए कि संसार को वसुधैव कुटुंबकम का संदेश हमने दिया है। ऐसी हालत में हमारे प्रधानमंत्री की यह भी जिम्मेदारी हो जाती है कि विश्व को आहार संकट से उबारें। भारत को विश्व का नेतृत्व करना है। यह कब तक चलेगा कि विश्व भारत का नेतृत्व करे। पहले विश्व अपना आहार संकट दूर करे। नहीं कर सकता तो हमें विश्व नेता मान ले।
हमारे कृषि मंत्री ने मान लिया है कि इस वर्ष गेहूं की रिकॉर्ड फसल हुई है। सरकार ने भी जम कर गेहूं की खरीद की है। अब आटा सस्ता नहीं हो रहा है तो आप जानते हैं कि पूरी दुनिया खाद्य संकट का सामना कर रही है।
हमारे सेवा कर वित्त मंत्री ने जो कहा वह तो चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र (यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि हम पांचवीं पास नहीं हैं। इसलिए न तो यह जानते हैं कि चाणक्य कौन हैं, न यह कि यह अर्थशास्त्र क्या होता है) में भी ऐसा नहीं सोचा होगा जो हमारे वित्त मंत्री ने सोचा कि सरकार कीमतें रोकने के लिए अपनी आमदनी की भी कुर्बानी कर सकती है।
इसे आप सरकारी बोल वचन भर मत समझिए। अब तक आप हर सरकारी बात को सिर्फ बतक ही समझते आए हैं। इस बार सरकार जो कहा सो किया के मूड में है। इसका कारण भी है। अब सरकार को विश्व को राह दिखानी है। बस गर्मी गुजर जाने दीजिए। यहां गर्मी का मतलब ग्लोबल वार्मिंग वाली गर्मी नहीं है। यह कर्नाटक विधान सभा चुनाव की गर्मी है।
इसके बाद ही हम भारत के लोग नेतृत्व करेंगे वसुधैव आहार संकटम् का!
बाजार के युग में कहां सरकार कोई कार्रवाई कर सकती है इन पर। फिर अब तो यह आहार संकट भ्रष्टाचार के समान विश्वच्यापी हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने इसे विश्व सकंट मान लिया है।
हमारा अपना बस तो हमारी पंचायत पर तो चलता है नहीं, फिर विश्व को हम क्या राह दिखाएं। जबकि ऐसे मौकों पर दुनिया को रास्ता दिखाना हमारा जिम्मेदारी है। विश्व के सबसे बड़े मॉल में अमेरिका में भी बड़ी उलझन है कि वह विश्व को कौन सी राह दिखाए। अब अमेरिकी डेमोक्रेट एक अश्वेत और औरत में तो फैसला कर नहीं पा रहे हैं। फिर आहार संकट पर कैसे फैसला कर पाएंगे।
पर यही क्या कम बड़ी बात है कि दुनिया भर में खाने पीने की चीजें 40 फीसदी महंगी हो गईं हैं। हमारा देश भी दुनिया में ही है। हम भी संसार के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहे हैं।
हम हिंदुस्तानी बड़े ही स्वार्थी और अवसरवादी लोग हैं। हमें हर चीज मुफ्त में चाहिए। यह नहीं समझते कि सामान की बढ़ी हुई कीमत आपके स्टैंडर्ड ऑफ लीविंग को भी तो दर्शाती हैं। अगर इस नजरिए से देखेंगे तो महंगाई आपको तरक्की और प्रगति की पहचान भी दिखेगी।
हमेशा याद रखिए कि संसार को वसुधैव कुटुंबकम का संदेश हमने दिया है। ऐसी हालत में हमारे प्रधानमंत्री की यह भी जिम्मेदारी हो जाती है कि विश्व को आहार संकट से उबारें। भारत को विश्व का नेतृत्व करना है। यह कब तक चलेगा कि विश्व भारत का नेतृत्व करे। पहले विश्व अपना आहार संकट दूर करे। नहीं कर सकता तो हमें विश्व नेता मान ले।
हमारे कृषि मंत्री ने मान लिया है कि इस वर्ष गेहूं की रिकॉर्ड फसल हुई है। सरकार ने भी जम कर गेहूं की खरीद की है। अब आटा सस्ता नहीं हो रहा है तो आप जानते हैं कि पूरी दुनिया खाद्य संकट का सामना कर रही है।
हमारे सेवा कर वित्त मंत्री ने जो कहा वह तो चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र (यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि हम पांचवीं पास नहीं हैं। इसलिए न तो यह जानते हैं कि चाणक्य कौन हैं, न यह कि यह अर्थशास्त्र क्या होता है) में भी ऐसा नहीं सोचा होगा जो हमारे वित्त मंत्री ने सोचा कि सरकार कीमतें रोकने के लिए अपनी आमदनी की भी कुर्बानी कर सकती है।
इसे आप सरकारी बोल वचन भर मत समझिए। अब तक आप हर सरकारी बात को सिर्फ बतक ही समझते आए हैं। इस बार सरकार जो कहा सो किया के मूड में है। इसका कारण भी है। अब सरकार को विश्व को राह दिखानी है। बस गर्मी गुजर जाने दीजिए। यहां गर्मी का मतलब ग्लोबल वार्मिंग वाली गर्मी नहीं है। यह कर्नाटक विधान सभा चुनाव की गर्मी है।
इसके बाद ही हम भारत के लोग नेतृत्व करेंगे वसुधैव आहार संकटम् का!
यार बोर हो गये।
गर्मियों के साथ छुट्टियों का मौसम भी शुरू हो जाता है। इस मौसम में तरह-तरह की बीमारियां फैलती हैं। इसमें एक बीमारी का नाम है, यार बोर हो गये।
यार बोर हो गये मल्टीपलेक्स वाले सिनेमा घरों में देखा जा सकता है। यह बस से ले कर रेल रिजर्वेशन की कतार में खड़ा हुआ पाया जाता है। अगर अभी भी किताब पढ़ते हों तो उसमें पढ़ा जा सकता है यार बोर हो गये।
इसे आप कपड़ों की शक्ल में पहन भी सकते हैं। पसीने के रूप में बहा सकते हैं। पांचवीं पास हैं तो जवाब बना सकते हैं। सांसद हैं तो प्रश्ननुमा भाषण दे सकते हैं। प्रधानमंत्री हैं तो मुनाफाखोरी के खिलाफ अपनी राय दे सकते हैं। इसे आप महंगाई बना कर खूब खाते हुए अनाज संकट पर कह सकते हैं कि यार बोर हो गये।
बोर होने की वजहों का शास्त्रीय सांस्कृतिक सर्वेक्षण के बाद इस नतीजे पर पहुंचा गया है कि इसका संबंध किसी उम्र से नहीं है। सामाजिक–आर्थिक–राजनीतिक सर्वेक्षण इस लिए नहीं किया गया कि उसमें बोर तत्व सनातन काल से शामिल है।
अब आप चाहें तो इसमें आपके घर में जमा हुआ टेलीविजन सेट के कार्यक्रमों को भी जोड़ लीजिए। आप जहां जाएंगे, हमें पाएंगे की शैली में इसे भौंकते हुए पाएंगे यार बोर हो गये।
अलग-अलग सर्वेक्षणकर्ताओं की यह राय जरूर है कि इसका संबंध दांपत्य जीवन से अवश्य है। इसे सर्वेक्षणकर्ताओं ने अनुभव किया है। पर प्रश्न के रूप में पति–पत्नी से पूछ नहीं पाए हैं। इसलिए इसे प्रमाणित नहीं माना जा सकता। फिर भी इस पर अनेक प्रकार के परीक्षण हुए हैं। उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी पति में या किसी पत्नी में यह साहस नहीं होता कि एक दूसरे से, जरा प्यार से भी कह सकें कि यार बोर हो गये।
दरअसल सर्वेक्षणकर्ताओं ने यह भी पाया कि पतिगण पत्नियों से और पत्नीगण पतियों से सबसे ज्यादा बोर होते हैं। पर कहते नहीं हैं। कहने से बोरियत तो मिट जाती है। लेकिन दांपत्य जीवन का आनंद भी नष्ट हो जाता है।
ऐसी स्थिति में विभिन्न माध्यमों से पड़ोसियों को बोर कर परम आनंद को प्राप्त करते हैं। पड़ोसी धर्म को निभाने वाले अपने यार दोस्तों से जब अपने पड़ोसियों के बारे में बातचीत करते हैं तो उसकी समाप्ति इसी बात पर होती है कि हम अपने पड़ोसी से यार बोर हो गये।
सर्वेक्षणकर्ताओं ने यह भी पाया कि बोरियत को जन्म देने वाले कारणों में हमारे शिक्षण संस्थान भी हैं। अब आचार्य विष्णु शर्मा के पंचतंत्र का काल तो है नहीं कि बोर हुए कुमारों को रसमय कहानियों से शिक्षा दी जाए। अगर रसमय कहानियां बची खुची होती तो उन पर एक सीरियल या फिल्म न बन जाती।
अब तक पाठशाला से ले कर विश्वाविद्यालय हैं। कुछ लोग ऐसे पाठशालाओं को बोरालय भी कहते हैं। पर किसमें हिम्मत है जो कहे कि यार बोर हो गये।
इसे पढ़ कर जोर से कहें यार बोर हो गये!
यार बोर हो गये मल्टीपलेक्स वाले सिनेमा घरों में देखा जा सकता है। यह बस से ले कर रेल रिजर्वेशन की कतार में खड़ा हुआ पाया जाता है। अगर अभी भी किताब पढ़ते हों तो उसमें पढ़ा जा सकता है यार बोर हो गये।
इसे आप कपड़ों की शक्ल में पहन भी सकते हैं। पसीने के रूप में बहा सकते हैं। पांचवीं पास हैं तो जवाब बना सकते हैं। सांसद हैं तो प्रश्ननुमा भाषण दे सकते हैं। प्रधानमंत्री हैं तो मुनाफाखोरी के खिलाफ अपनी राय दे सकते हैं। इसे आप महंगाई बना कर खूब खाते हुए अनाज संकट पर कह सकते हैं कि यार बोर हो गये।
बोर होने की वजहों का शास्त्रीय सांस्कृतिक सर्वेक्षण के बाद इस नतीजे पर पहुंचा गया है कि इसका संबंध किसी उम्र से नहीं है। सामाजिक–आर्थिक–राजनीतिक सर्वेक्षण इस लिए नहीं किया गया कि उसमें बोर तत्व सनातन काल से शामिल है।
अब आप चाहें तो इसमें आपके घर में जमा हुआ टेलीविजन सेट के कार्यक्रमों को भी जोड़ लीजिए। आप जहां जाएंगे, हमें पाएंगे की शैली में इसे भौंकते हुए पाएंगे यार बोर हो गये।
अलग-अलग सर्वेक्षणकर्ताओं की यह राय जरूर है कि इसका संबंध दांपत्य जीवन से अवश्य है। इसे सर्वेक्षणकर्ताओं ने अनुभव किया है। पर प्रश्न के रूप में पति–पत्नी से पूछ नहीं पाए हैं। इसलिए इसे प्रमाणित नहीं माना जा सकता। फिर भी इस पर अनेक प्रकार के परीक्षण हुए हैं। उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी पति में या किसी पत्नी में यह साहस नहीं होता कि एक दूसरे से, जरा प्यार से भी कह सकें कि यार बोर हो गये।
दरअसल सर्वेक्षणकर्ताओं ने यह भी पाया कि पतिगण पत्नियों से और पत्नीगण पतियों से सबसे ज्यादा बोर होते हैं। पर कहते नहीं हैं। कहने से बोरियत तो मिट जाती है। लेकिन दांपत्य जीवन का आनंद भी नष्ट हो जाता है।
ऐसी स्थिति में विभिन्न माध्यमों से पड़ोसियों को बोर कर परम आनंद को प्राप्त करते हैं। पड़ोसी धर्म को निभाने वाले अपने यार दोस्तों से जब अपने पड़ोसियों के बारे में बातचीत करते हैं तो उसकी समाप्ति इसी बात पर होती है कि हम अपने पड़ोसी से यार बोर हो गये।
सर्वेक्षणकर्ताओं ने यह भी पाया कि बोरियत को जन्म देने वाले कारणों में हमारे शिक्षण संस्थान भी हैं। अब आचार्य विष्णु शर्मा के पंचतंत्र का काल तो है नहीं कि बोर हुए कुमारों को रसमय कहानियों से शिक्षा दी जाए। अगर रसमय कहानियां बची खुची होती तो उन पर एक सीरियल या फिल्म न बन जाती।
अब तक पाठशाला से ले कर विश्वाविद्यालय हैं। कुछ लोग ऐसे पाठशालाओं को बोरालय भी कहते हैं। पर किसमें हिम्मत है जो कहे कि यार बोर हो गये।
इसे पढ़ कर जोर से कहें यार बोर हो गये!
रेस्तरां में खाने जा रहे हैं? सावधान
29 अप्रैल 2008
यदि आप अमेरिका जाने की सोच रहे हैं तो वहां के रेस्तरां में खाने से बचिए। एक नए अध्ययन के अनुसार अमेरिका में लगभग 7.6 करोड़ लोग रेस्तरां में भोजन करने के कारण कई प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो गए हैं।
वनडर्बिट विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया गया है कि ज्यादातर लोग रेस्तरां में जाने से पहले वहां का कोई निरीक्षण नहीं करते।
लगभग 2000 वयस्कों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि सभी ऐसा मानते है कि स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा रेस्तराओं का रोजाना निरीक्षण किया जाता है।
शोधकर्ता टिमोथी एफ.जोंस कहते हैं कि, “हमने अध्ययन में पाया कि उपभोक्ताओं को रेस्तराओं के बारे में धारणा रहती कि वहां तो साफ-सुथरा भोजन ही मिलेगा लेकिन उनकी ये धारणा अव्यावहारिक और सरासर गलत है।”
जबकि 50 फीसदी लोग सोचते थे कि साल में पांच से 12 बार वहां अधिकारियों द्वारा दौरा किया जाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि वास्तव में साल में सिर्फ दो बार रेस्तराओं का निरीक्षण किया जाता है। गौरतलब है कि अमेरिका के रेस्तराओं में हर साल 70 अरब डॉलर का खाद्य पदार्थ बिकता है जो कि देश के कुल खाद्य खर्च का 47 फीसदी है।
यदि आप अमेरिका जाने की सोच रहे हैं तो वहां के रेस्तरां में खाने से बचिए। एक नए अध्ययन के अनुसार अमेरिका में लगभग 7.6 करोड़ लोग रेस्तरां में भोजन करने के कारण कई प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो गए हैं।
वनडर्बिट विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया गया है कि ज्यादातर लोग रेस्तरां में जाने से पहले वहां का कोई निरीक्षण नहीं करते।
लगभग 2000 वयस्कों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि सभी ऐसा मानते है कि स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा रेस्तराओं का रोजाना निरीक्षण किया जाता है।
शोधकर्ता टिमोथी एफ.जोंस कहते हैं कि, “हमने अध्ययन में पाया कि उपभोक्ताओं को रेस्तराओं के बारे में धारणा रहती कि वहां तो साफ-सुथरा भोजन ही मिलेगा लेकिन उनकी ये धारणा अव्यावहारिक और सरासर गलत है।”
जबकि 50 फीसदी लोग सोचते थे कि साल में पांच से 12 बार वहां अधिकारियों द्वारा दौरा किया जाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि वास्तव में साल में सिर्फ दो बार रेस्तराओं का निरीक्षण किया जाता है। गौरतलब है कि अमेरिका के रेस्तराओं में हर साल 70 अरब डॉलर का खाद्य पदार्थ बिकता है जो कि देश के कुल खाद्य खर्च का 47 फीसदी है।
एड्स : संक्रमण की रोकथाम मुमकिन
एड्सः संक्रमण की रोकथाम मुमकिन
30 अप्रैल 2008
वाशिंगटन। मनुष्य के शरीर की कोशिकाओं में एक ऐसे प्रोटीन का पता लगा लिया गया है जिसे रोककर एचआईवी के संक्रमण को रोका जा सकता है। यह बात एक नए अध्ययन में सामने आई है।
पहले चिकित्सक इसके लिए ‘मल्टीड्रग’ प्रणाली का प्रयोग करते थे जिसमें मरीज को अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं। इस पद्धति में ढेरों खतरे थे क्योंकि इसके दुष्परिणाम बहुत अधिक थे।
चूंकि ‘एचआईवी वायरस’ में तेजी से बढ़ने और बदलने की क्षमता होती है। इसलिए वे दवाओं द्वारा आसानी से काबू में नहीं किए जाते। अपने शोध में ‘बोस्टन विश्वविद्यालय’ के एंड्रयू जे. हेंडरसन और ‘एनएचजीआर आई’ संस्था के शोधकर्ताओं ने पाया कि जब वे आईटीके नामक प्रोटीन को रोकने में सफल रहे तो एचआईवी संक्रमण को बढ़ाने वाली ‘टी’ कोशिकाओं की वृद्धि भी रूक गई।
‘नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस’ में प्रकाशित अध्ययन के निष्कर्ष में शोधकर्ता इरिक डी. ग्रीन ने बताया है कि यह ये निष्कर्ष एचआईवी संबंधित शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
30 अप्रैल 2008
वाशिंगटन। मनुष्य के शरीर की कोशिकाओं में एक ऐसे प्रोटीन का पता लगा लिया गया है जिसे रोककर एचआईवी के संक्रमण को रोका जा सकता है। यह बात एक नए अध्ययन में सामने आई है।
पहले चिकित्सक इसके लिए ‘मल्टीड्रग’ प्रणाली का प्रयोग करते थे जिसमें मरीज को अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं। इस पद्धति में ढेरों खतरे थे क्योंकि इसके दुष्परिणाम बहुत अधिक थे।
चूंकि ‘एचआईवी वायरस’ में तेजी से बढ़ने और बदलने की क्षमता होती है। इसलिए वे दवाओं द्वारा आसानी से काबू में नहीं किए जाते। अपने शोध में ‘बोस्टन विश्वविद्यालय’ के एंड्रयू जे. हेंडरसन और ‘एनएचजीआर आई’ संस्था के शोधकर्ताओं ने पाया कि जब वे आईटीके नामक प्रोटीन को रोकने में सफल रहे तो एचआईवी संक्रमण को बढ़ाने वाली ‘टी’ कोशिकाओं की वृद्धि भी रूक गई।
‘नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस’ में प्रकाशित अध्ययन के निष्कर्ष में शोधकर्ता इरिक डी. ग्रीन ने बताया है कि यह ये निष्कर्ष एचआईवी संबंधित शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
Wednesday, April 30, 2008
ज़िंदगी के करीब 35 साल दूसरे देश पाकिस्तान के जेल में बीत गए-आसान तो नहीं होता पर कहते हैं न कि अगर किसी की याद दिल में बसा लो, तो वक़्त कट ही जाता है. या किसी चीज़ की लौ दिल में जला लो, समय निकल जाता है.
कश्मीर सिंह की डायरी पर राय भेजिए
जब-जब उदासी घिरने लगती और मन परेशान हो जाता तो मैं किताबों की आगोश में खो जाता. क़िताब का एक-एक शब्द जैसे एक-एक ज़ख़्म पर मरहम लगाने की कोशिश कर रहा हो- मन को बड़ा सुकून मिलता था.
किताब, रसाले, उपन्यास जो हाथ लगता पढ़ डालता था.
जब मैं भारत से पाकिस्तान आया था तो मेरे बच्चे बहुत छोटे थे. उनकी याद सताती थी मुझे लेकिन कुछ कर नहीं सकता था- मजबूर था.
नाज़ुक दिल आपके दर्द को और गहरा कर देता है. सो बाद में मैने ये सोचना कम कर दिया कि बच्चे क्या कर रहे होंगे क्योंकि अगर दिलो-दिमाग़ में हर वक़्त यही ख़्याल रहता तो मैं जेल में ज़िंदा बचता ही नहीं.
बस ख़ुद को यही तसल्ली देता रहा कि बच्चे जहाँ भी होंगे सही-सलामत ही होंगे.
(पाकिस्तानी जेल में 35 साल तक क़ैद रहे भारत के नागरिक कश्मीर सिंह की आख़िरी डायरी आप बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर अगले हफ़्ते पढ़ सकते हैं. इस लेख पर अपनी राय हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर भी भेज सकते हैं.)
फ़रिश्ता कहूँ या अवतार...
अंसरा बर्नी ने कश्मीर सिंह की रिहाई में अहम भूमिका निभाई
जेल में रहते हुए 1988 में मुझे पक्षाघात भी हो गया. वक़्त के थपेड़ों ने तन-मन दोनों को कमज़ोर करना शुरू कर दिया था. जैसे-जैसे समय बीतता गया जेल से रिहा होने के आसार कम होते नज़र आने लगे.
ज़िंदगी जैसे-तैसे कट रही थी - किसी लंबे, रहस्यमय अंतहीन उपन्यास की कहानी के जैसी ज़िंदगी,वो कहानी जिसे शुरू करने के बाद छोड़ दिया गया हो और जिसे अपने अंजाम की तलाश हो.
उसी दौरान एक फ़रिश्ता आया मेरे जीवन में- अंसार बर्नी. उनसे मिलने के बाद हालात ने अजब तरीके से करवट बदले और जो कुछ भी अच्छा हुआ वो पाकिस्तान के पूर्व मानवाधिकार मामलों के मंत्री अंसार बर्नी की ही मेहरबानी है.
मेरे लिए तो वे अवतार बनकर आए- भगवान कहिए, वाहे गुरु कहिए या अल्लाह समझ लो.
वर्ष 2008 के जनवरी महीने में बर्नी साहब जेल का दौरा करने आए. अंसार बर्नी मेरी चक्की भी आए. चक्की मतलब वो क्वार्टर जहाँ मैं बंद था.
क़ैदियों से पूछा गया कि हमारी सज़ा कितने साल की है. उसी दौरान मैने बताया कि सज़ा-ए-मौत सुनाए हुए मुझे 30 से ज़्यादा साल हो गए हैं.
अंसार बर्नी ने बस इतनी बात सुनी और मेरा नाम लिखकर ले गए. मेरा ही नहीं, वहाँ जितने भी क़ैदी थे जिनकी सज़ा को 10 साल हो चुके थे, वे सबका नाम ले गए.
इन 14 लोगों में सरबजीत सिंह का नाम भी शामिल था. पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास माफ़ीनामी के लिए अपील गई. उन्हें बताया गया कि मैं 35 साल से यहां बंद हूँ.
पिछले 35 सालों से समय का पहिया जैसे मेरे लिए रुका हुआ था. फिर चंद ही महीनों में समय का चक्का ऐसा सरपट दौड़ा कि अभी तक उससे कदमताल करने की कोशिश में जुटा हूँ.
बर्नी साहब से मिलने के कुछ महीनों के अंदर ही मेरी कोठी तोड़ दी गई..आपकी भाषा में बोलूँ तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने मुझे रिहा करने का आदेश दे दिया.
पंछी बनूँ उड़ता फिरूँ मस्त गगन में
कश्मीर सिंह की पत्नी और बेटे ने बरसों उनका इंतज़ार किया
तीन दशकों तक मैने काल-कोठरी के अंधेरे में तन्हा जीवन बिताया था. इतने सालों बाद जब बाहर क़दम रखा तो आँखों को चौंधियाती रोशनी मिली, नीला आसमां देखा, आसमां में उड़ते पंछी देखे. खुली हवा में साँस लेने को मिला तो ऐसा महसूस हुआ कि मैं बस अभी-अभी पैदा हुआ हूँ....इसके आगे सोचने-समझने का मन भी नहीं था मुझे,शब्द गौण हो गए थे.
भगवान ने मुझे नई ज़िंदगी दी थी, जेल से निकलकर मैं गुरुद्वारे गया और मत्था टेका.
रात एक आलीशान होटल में बिताने को मिली..मन में उत्सुकता थी. तीन मार्च 2008 को मैं रिहा हुआ और चार मार्च को मुझे बड़ी इज़्ज़त के साथ वाघा बॉर्डर पर छोड़ दिया गया.
बाक़ायदा मेरा पासपोर्ट बनाया गया था. मुझे पाकिस्तानी पुलिसवालों के हवाले नहीं किया गया. सीधा भारत भेज दिया गया अपने परिवार के पास-जैसे किसी भी व्यक्ति को भेजा जाता है जो पासपोर्ट के ज़रिए यहाँ से वहाँ जाता है..अदब से.
भारत-पाक सीमा पर देखा तो टीवी चैनलों और पत्रकारों का हुजूम उमड़ा हुआ था..अचानक मैं उनकी नज़रों में ‘अहम’ शख़्स बन गया, हर कोई इंटरव्यूह लेना चाहता था.
कुछ देर के लिए रब्ब ने मुझे एक ऐसी ऊँचाई पर ज़रूर पहुँचाया दिया था जहाँ लगे कि आप बड़ी हस्ती हैं लेकिन मैं इस सब के काबिल नहीं हूँ.
ख़ैर भारत की सीमा में क़दम रखा तो आँखें अपने नन्हे मुन्ने बच्चों को तलाश रही थीं. जब जेल में था तो हमेशा मन में यही तस्वीर रहती थी कि एक दिन जब वापस आऊँगा तो मेरे बच्चे मुझे वैसे ही मिलेंगे जैसा मैं उन्हें छोड़कर आया था. और अब जब भारत लौटा हूँ तो बच्चे वैसे ही मिल भी गए हैं.
बस फ़र्क यही है कि मैं दो बेटे छोड़ कर गया था, अब वापस आया हूँ तो जिस उम्र के बेटे छोड़ कर गया था अब उसी उम्र के पोते मिल गए हैं. एक बेटी थी पहले मेरी पर अब चार बेटियाँ और मिल गई हैं- मेरी दो बहुएँ और दो पोतियाँ भी तो बेटियों समान हैं.
एक बेटा मेरे साथ अब गाँव में ही रहता है. वहीं दूसरा बेटा इटली में काम करने गया हुआ है. मुझे मिलने वो इटली से भारत आया था कुछ दिन पहले. हम दोनों ने एक दूसरे से मुलाक़ात की.
लेकिन पता नहीं क्यों इटली वापस जाते समय न वो मुझसे मिलने आया न मैं उससे मिला...... वो एक-दो रोज़ मुझसे मिला लेकिन फिर मिलना शायद उसे पसंद न आया हो. बहुत सारी बातें अनकही-अनसुलझी रह गई.
मेरी बिटिया रानी भी इटली में रहती है और जून में अपने बेटे के इम्तिहान के बाद मुझसे मिलने आएगी. मुझे इंतज़ार रहेगा....
(अगली बार डायरी की आख़िरी कड़ी में ज़िक्र उन भारतीय क़ैदियों का जिन्हें मैने पाकिस्तानी जेल में देखा है, बात अपने गाँव में आने के बाद के अनुभवों की और वहाँ अपनी पुरानी पहचान तलाश कर रहे कश्मीर सिंह की)
(35 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद कश्मीर सिंह चार मार्च 2008 को अपने वतन लौटे हैं. कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों पर आधारित यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है. इस डायरी की आख़िरी कड़ी आप अगले हफ़्ते पढ़ पाएँगे)
कश्मीर सिंह की डायरी पर राय भेजिए
जब-जब उदासी घिरने लगती और मन परेशान हो जाता तो मैं किताबों की आगोश में खो जाता. क़िताब का एक-एक शब्द जैसे एक-एक ज़ख़्म पर मरहम लगाने की कोशिश कर रहा हो- मन को बड़ा सुकून मिलता था.
किताब, रसाले, उपन्यास जो हाथ लगता पढ़ डालता था.
जब मैं भारत से पाकिस्तान आया था तो मेरे बच्चे बहुत छोटे थे. उनकी याद सताती थी मुझे लेकिन कुछ कर नहीं सकता था- मजबूर था.
नाज़ुक दिल आपके दर्द को और गहरा कर देता है. सो बाद में मैने ये सोचना कम कर दिया कि बच्चे क्या कर रहे होंगे क्योंकि अगर दिलो-दिमाग़ में हर वक़्त यही ख़्याल रहता तो मैं जेल में ज़िंदा बचता ही नहीं.
बस ख़ुद को यही तसल्ली देता रहा कि बच्चे जहाँ भी होंगे सही-सलामत ही होंगे.
(पाकिस्तानी जेल में 35 साल तक क़ैद रहे भारत के नागरिक कश्मीर सिंह की आख़िरी डायरी आप बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर अगले हफ़्ते पढ़ सकते हैं. इस लेख पर अपनी राय हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर भी भेज सकते हैं.)
फ़रिश्ता कहूँ या अवतार...
अंसरा बर्नी ने कश्मीर सिंह की रिहाई में अहम भूमिका निभाई
जेल में रहते हुए 1988 में मुझे पक्षाघात भी हो गया. वक़्त के थपेड़ों ने तन-मन दोनों को कमज़ोर करना शुरू कर दिया था. जैसे-जैसे समय बीतता गया जेल से रिहा होने के आसार कम होते नज़र आने लगे.
ज़िंदगी जैसे-तैसे कट रही थी - किसी लंबे, रहस्यमय अंतहीन उपन्यास की कहानी के जैसी ज़िंदगी,वो कहानी जिसे शुरू करने के बाद छोड़ दिया गया हो और जिसे अपने अंजाम की तलाश हो.
उसी दौरान एक फ़रिश्ता आया मेरे जीवन में- अंसार बर्नी. उनसे मिलने के बाद हालात ने अजब तरीके से करवट बदले और जो कुछ भी अच्छा हुआ वो पाकिस्तान के पूर्व मानवाधिकार मामलों के मंत्री अंसार बर्नी की ही मेहरबानी है.
मेरे लिए तो वे अवतार बनकर आए- भगवान कहिए, वाहे गुरु कहिए या अल्लाह समझ लो.
वर्ष 2008 के जनवरी महीने में बर्नी साहब जेल का दौरा करने आए. अंसार बर्नी मेरी चक्की भी आए. चक्की मतलब वो क्वार्टर जहाँ मैं बंद था.
क़ैदियों से पूछा गया कि हमारी सज़ा कितने साल की है. उसी दौरान मैने बताया कि सज़ा-ए-मौत सुनाए हुए मुझे 30 से ज़्यादा साल हो गए हैं.
अंसार बर्नी ने बस इतनी बात सुनी और मेरा नाम लिखकर ले गए. मेरा ही नहीं, वहाँ जितने भी क़ैदी थे जिनकी सज़ा को 10 साल हो चुके थे, वे सबका नाम ले गए.
इन 14 लोगों में सरबजीत सिंह का नाम भी शामिल था. पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास माफ़ीनामी के लिए अपील गई. उन्हें बताया गया कि मैं 35 साल से यहां बंद हूँ.
पिछले 35 सालों से समय का पहिया जैसे मेरे लिए रुका हुआ था. फिर चंद ही महीनों में समय का चक्का ऐसा सरपट दौड़ा कि अभी तक उससे कदमताल करने की कोशिश में जुटा हूँ.
बर्नी साहब से मिलने के कुछ महीनों के अंदर ही मेरी कोठी तोड़ दी गई..आपकी भाषा में बोलूँ तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने मुझे रिहा करने का आदेश दे दिया.
पंछी बनूँ उड़ता फिरूँ मस्त गगन में
कश्मीर सिंह की पत्नी और बेटे ने बरसों उनका इंतज़ार किया
तीन दशकों तक मैने काल-कोठरी के अंधेरे में तन्हा जीवन बिताया था. इतने सालों बाद जब बाहर क़दम रखा तो आँखों को चौंधियाती रोशनी मिली, नीला आसमां देखा, आसमां में उड़ते पंछी देखे. खुली हवा में साँस लेने को मिला तो ऐसा महसूस हुआ कि मैं बस अभी-अभी पैदा हुआ हूँ....इसके आगे सोचने-समझने का मन भी नहीं था मुझे,शब्द गौण हो गए थे.
भगवान ने मुझे नई ज़िंदगी दी थी, जेल से निकलकर मैं गुरुद्वारे गया और मत्था टेका.
रात एक आलीशान होटल में बिताने को मिली..मन में उत्सुकता थी. तीन मार्च 2008 को मैं रिहा हुआ और चार मार्च को मुझे बड़ी इज़्ज़त के साथ वाघा बॉर्डर पर छोड़ दिया गया.
बाक़ायदा मेरा पासपोर्ट बनाया गया था. मुझे पाकिस्तानी पुलिसवालों के हवाले नहीं किया गया. सीधा भारत भेज दिया गया अपने परिवार के पास-जैसे किसी भी व्यक्ति को भेजा जाता है जो पासपोर्ट के ज़रिए यहाँ से वहाँ जाता है..अदब से.
भारत-पाक सीमा पर देखा तो टीवी चैनलों और पत्रकारों का हुजूम उमड़ा हुआ था..अचानक मैं उनकी नज़रों में ‘अहम’ शख़्स बन गया, हर कोई इंटरव्यूह लेना चाहता था.
कुछ देर के लिए रब्ब ने मुझे एक ऐसी ऊँचाई पर ज़रूर पहुँचाया दिया था जहाँ लगे कि आप बड़ी हस्ती हैं लेकिन मैं इस सब के काबिल नहीं हूँ.
ख़ैर भारत की सीमा में क़दम रखा तो आँखें अपने नन्हे मुन्ने बच्चों को तलाश रही थीं. जब जेल में था तो हमेशा मन में यही तस्वीर रहती थी कि एक दिन जब वापस आऊँगा तो मेरे बच्चे मुझे वैसे ही मिलेंगे जैसा मैं उन्हें छोड़कर आया था. और अब जब भारत लौटा हूँ तो बच्चे वैसे ही मिल भी गए हैं.
बस फ़र्क यही है कि मैं दो बेटे छोड़ कर गया था, अब वापस आया हूँ तो जिस उम्र के बेटे छोड़ कर गया था अब उसी उम्र के पोते मिल गए हैं. एक बेटी थी पहले मेरी पर अब चार बेटियाँ और मिल गई हैं- मेरी दो बहुएँ और दो पोतियाँ भी तो बेटियों समान हैं.
एक बेटा मेरे साथ अब गाँव में ही रहता है. वहीं दूसरा बेटा इटली में काम करने गया हुआ है. मुझे मिलने वो इटली से भारत आया था कुछ दिन पहले. हम दोनों ने एक दूसरे से मुलाक़ात की.
लेकिन पता नहीं क्यों इटली वापस जाते समय न वो मुझसे मिलने आया न मैं उससे मिला...... वो एक-दो रोज़ मुझसे मिला लेकिन फिर मिलना शायद उसे पसंद न आया हो. बहुत सारी बातें अनकही-अनसुलझी रह गई.
मेरी बिटिया रानी भी इटली में रहती है और जून में अपने बेटे के इम्तिहान के बाद मुझसे मिलने आएगी. मुझे इंतज़ार रहेगा....
(अगली बार डायरी की आख़िरी कड़ी में ज़िक्र उन भारतीय क़ैदियों का जिन्हें मैने पाकिस्तानी जेल में देखा है, बात अपने गाँव में आने के बाद के अनुभवों की और वहाँ अपनी पुरानी पहचान तलाश कर रहे कश्मीर सिंह की)
(35 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद कश्मीर सिंह चार मार्च 2008 को अपने वतन लौटे हैं. कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों पर आधारित यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है. इस डायरी की आख़िरी कड़ी आप अगले हफ़्ते पढ़ पाएँगे)
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